کاش میں دورِ حسینی میں آیا ہوتا
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टाइटल : प्यासी है सकीना
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मर्सिया/नोहा नात के बोल (लीरिक्स) नज़्म के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : नदीम रज़ा क़ुरैशी (पीलीभीती)
नातख्वान/कलाकार: नदीम रज़ा क़ुरैशी (पीलीभीती)
जोड़ा गया : 16 Jun, 2026 05:25 PM IST
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ऐ बाद-ए-सबा जाके ये चाचा को बताना, प्यासी है सकीना
ऐ बाद-ए-सबा जाके ये चाचा को बताना, प्यासी है सकीना
इस छोटे से सीने में सितम मैंने उठाए,
अल्लाह किसी को भी न यतीम ऐसा बनाए,
खुद अपने लहू में कोई बच्ची न नहाए,
मैं तुम को बुलाती रही, तुम भी तो न आए,
मैं बन गई बदस्त-ए-लईनों का निशाना,
प्यासी है सकीना...
ऐ बाद-ए-सबा जाके ये चाचा को बताना, प्यासी है सकीना
पानी की तलब मुझको खिलाती रही ठोकर,
कहता था ला दूँगा मैं फ़ौजों को पिला कर,
जब शिम्र ला कर चुका सेराब ये लश्कर,
दिखला के मुझे फेंक दिया पानी ज़मीन पर,
तब समझी मैं होता है क्या उम्मीद दिलाना,
प्यासी है सकीना...
ऐ बाद-ए-सबा जाके ये चाचा को बताना, प्यासी है सकीना
एक जाम हुआ शाम-ए-ग़रीबाँ में मयस्सर,
वो कूज़ा मैं रख आई थी असगर की लहद पर,
था मुझसे भी छोटा मेरा भैया मेरा दिलबर,
शर्मिंदा मैं हो जाती चाचा प्यास बुझा कर,
अब अपने ही हाथों से मेरी प्यास बुझाना,
प्यासी है सकीना...
ऐ बाद-ए-सबा जाके ये चाचा को बताना, प्यासी है सकीना
जिस रोज़ से अकबर को मिला बाबा का सीना,
उस रोज़ से चाचा नहीं सो पाई सकीना,
किस हाल में जाऊँगी, मैं किस तरह मदीना,
आ जाए मुझे मौत है किस काम का जीना,
जागी हूँ बोहोत आके चाचा मुझको सुलाना,
प्यासी है सकीना...
ऐ बाद-ए-सबा जाके ये चाचा को बताना, प्यासी है सकीना
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यह नौहा हज़रत सकीना (अ.स.) की प्यास, उनकी मासूमियत और कर्बला में उन पर ढाए गए ज़ुल्म का बयान है, जिसमें वह सुबह की ठंडी हवा (बाद-ए-सबा) के ज़रिए अपने चचा हज़रत अब्बास (अ.स.) तक अपना दर्दनाक पैग़ाम पहुँचा रही हैं।
इस नौहे का मतलब है कि हज़रत सकीना कर्बला की तबाही के बाद बेहद प्यासी और अकेली हैं। वह हवा से कहती हैं कि मेरे चचा अब्बास के पास जाओ और उन्हें बताओ कि उनके जाने के बाद यज़ीदी फ़ौज ने इस मासूम बच्ची पर बहुत ज़ुल्म किए हैं, यहाँ तक कि पानी की उम्मीद दिलाकर भी ज़मीन पर बहा दिया गया।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| बाद-ए-सबा | सुबह की ठंडी और नर्म हवा |
| यतीम | अनाथ (जिसके माता-पिता या पिता न हों) |
| बदस्त-ए-लईनों | ज़ालिमों/दुष्टों के हाथों (मल्ऊन लोगों के हाथ) |
| तलब | चाहत / प्यास की तड़प |
| शाम-ए-ग़रीबाँ | आशूरा (10 मुहर्रम) की वह दर्दनाक शाम जब अहले-बैत के ख़ैमे जला दिए गए थे |
| मयस्सर | नसीब होना / प्राप्त होना |
| कूज़ा | मिट्टी का छोटा प्याला या बर्तन |
| लहद | क़ब्र |
हज़रत सकीना (अ.स.) अपने चचा को पुकारते हुए कहती हैं कि दुश्मनों ने उन्हें पानी की ठोकरें दीं, लेकिन उन्होंने अपने छोटे भाई अली असग़र की प्यास को अपनी प्यास से बड़ा समझा और पानी का प्याला उनकी क़ब्र पर रख आईं। अब वह दुखों से इतना टूट चुकी हैं कि चचा अब्बास से आकर उन्हें हमेशा की नींद (मौत की आगोश में) सुलाने की गुज़ारिश कर रही हैं।
हज़रत सकीना ने पानी का कूज़ा (प्याला) असग़र की लहद (कब्र) पर क्यों रख दिया, और उन्होंने अपने चचा से किस तरह सुलाने की गुज़ारिश की है?