सदाए गुम्बद-ए-ख़ज़रा हुसैन जीत गए
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टाइटल : जहाँ पर नबी का घराना लुटा है
श्रेणी (कटेगरी) : मनकबत के बोल (लीरिक्स) मर्सिया/नोहा नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शाहिद रज़ा अशरफ़ी
नातख्वान/कलाकार: शाहिद रज़ा अशरफ़ी
जोड़ा गया : 20 Jun, 2026 08:57 AM IST
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अजब मोमिनो नक्शा-ए-कर्बला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
जिसे सुन के सारा जहाँ रो पड़ा है,
ज़मीन तो ज़मीन आसमान रो पड़ा है,
शहीदों में छः माह का लाडला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
अजब मोमिनो नक्शा-ए-кर्बला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
जो नाना के आँगन में बच्चा पला है,
वो बाँधे कफ़न सर पे कर्बला चला है,
वहीं से शहादत को रुतबा मिला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
अजब मोमिनो नक्शा-ए-कर्बला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
जिसे फ़ातिमा बी का आँचल मिला है,
वही तो हज़ारों से तन्हा लड़ा है,
सरियत वही से ही फूला-फला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
अजब मोमिनो नक्शा-ए-कर्बला है,
जहाँ पर नबी का घराना लुटा है।
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यह कर्बला के वाकिये की दर्दनाक दास्तान है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह इमाम हुसैन और नबी ﷺ के पाक घराने ने हक की खातिर अपनी हर चीज कुर्बान कर दी और शहादत को हमेशा के लिए जिंदा कर दिया।
इस लिरिक्स का मतलब है कि कर्बला का मंजर बेहद दर्दनाक और अनोखा है जहाँ पैगंबर मोहम्मद ﷺ का पूरा परिवार शहीद हो गया, जिसे सुनकर जमीन और आसमान सब रो पड़े। इसमें ६ महीने के मासूम बच्चे (अली असगर) से लेकर बीबी फातिमा के लाडले (इमाम हुसैन) की बहादुरी और कुर्बानी का जिक्र है, जिन्होंने अकेले हजारों का मुकाबला किया और दीन-ए-इस्लाम को बचा लिया।
| शब्द | अर्थ (हिंदी / English) |
|---|---|
| नक्शा-ए-कर्बला | कर्बला का मंजर / The scene of Karbala |
| मोमिनो | ईमान वालों / Believers |
| छः माह का लाडला | ६ महीने का मासूम बच्चा (हजरत अली असगर) / 6-month-old beloved child |
| नाना | हजरत मोहम्मद ﷺ / Maternal Grandfather (Prophet Muhammad ﷺ) |
| शहादत | हक के लिए जान देना / Martyrdom |
| रुतबा | मुकाम या दर्जा / Status or Rank |
| आँचल | माँ का साया या आशीर्वाद / Protection or blessing of mother |
| सरियत (शरियत) | दीन-ए-इस्लाम का रास्ता / Islamic Law |
कर्बला में नबी ﷺ के घराने की कुर्बानी ने हक और सच्चाई को एक नया मुकाम दिया है। शायर कहते हैं कि उस मैदान में ६ महीने के मासूम बच्चे से लेकर बीबी फातिमा के लाडले तक सभी ने कफ़न बाँध कर जुल्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्हीं के इस महान बलिदान की वजह से आज इस्लाम जिंदा है और फूला-फला है।
इस कलाम के मुताबिक, हज़रत फ़ातिमा के उस लाडले ने मैदान-ए-कर्बला में अकेले हज़ारों का मुक़ाबला क्यों किया, और उनकी इस क़ुर्बानी से 'शरीअत' को क्या फ़ायदा पहुँचा?