ठंडी ठंडी हवा रहमतों की चली
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टाइटल : चमका माह-ए-नूर का हिलाल
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : ओवैस रज़ा कादरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 16 Aug, 2026 06:06 PM IST
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या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
बेकसों से है जिन्हें प्यार, वही आए हैं,
जो दो आलम के हैं ग़मख़्वार, वही आए हैं।
एक नज़र आसमाँ पर डाल, मरहबा,
चमका माह-ए-नूर का हिलाल, मरहबा मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
झंडे लगाओ, गलियाँ सजाओ,
कर लो चराग़ाँ, घर जगमगाओ,
राज़ी होगा रब्ब-ए-ज़ुलजलाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
महफ़िल सजाएँ, नातें सुनाएँ,
आका की आमद की धूम मचाएँ,
रोज़-ओ-शब यही हो अपना हाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
ला-रैब नबियों के सालार आए,
आए दो आलम के ग़मख़्वार आए,
शाहकार-ए-रब्ब-ए-ज़ुलजलाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
आशिक़ के दिल जगमगाने लगे हैं,
देखो ज़रा मुस्कुराने लगे हैं,
दीदनी हैं उनके ख़द्द-ओ-ख़ाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
सदक़ा विलादत का जलवा दिखा दो,
दिल की लगी अब तो आका बुझा दो,
दिखला दो अपना अब जमाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
जूद-ओ-सख़ावत है आदत तुम्हारी,
फैलाए दामन खड़े हैं भिखारी,
कर दो करम आमिना के लाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
जाम-ए-शहादत पिया है जिन्होंने,
अहले-सुन्नत को जिला दी उन्होंने,
याद आएँगे वो हर साल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
शादी के नग़्मे सुनाते रहेंगे,
जश्न-ए-विलादत मनाते रहेंगे,
वार देंगे तुम पे जान-ओ-माल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
पढ़ने लगा जब उबैद उनकी नातें,
होने लगीं चार-सू उसकी बातें,
फ़ैज़-ए-रज़ा का है सब कमाल, मरहबा।
या रसूल अल्लाह मरहबा मरहबा,
या हबीब अल्लाह मरहबा मरहबा।
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यह नात पैग़ंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद ﷺ की आमद की खुशी में जश्न मनाने, गलियों को सजाने और आका ﷺ की बारगाह में अपनी अकीदत व मोहब्बत पेश करने का एक बेहतरीन बयान है।
इन पंक्तियों का मतलब है कि बेसहारा लोगों से प्यार करने वाले और दोनों जहान के दर्द बाँटने वाले आका ﷺ दुनिया में تشریف ले आए हैं। उनकी आमद की खुशी में घरों में चराग़ाँ करने, झंडे लगाने और हमेशा नातें सुनाकर उनका जश्न मनाने का पैग़ दिया गया है।
| Word (शब्द) | Meaning (अर्थ) |
|---|---|
| ग़मख़्वार (Gham Khaar) | दुःख बाँटने वाला / दर्द समझने वाला |
| माह-ए-नूर (Mah-E-Noor) | नूर का चाँद (रोशन चाँद) |
| चराग़ाँ (Charaghan) | रोशनी करना या दिए जलाना |
| दीदनी (Deedani) | देखने लायक (आकर्षक) |
| जूद-ओ-सख़ावत (Jood-O-Sakhawat) | उदारता, दरियादिली और बख्शिश |
यह नात हुज़ूर ﷺ की विलादत की खुशी में झूमने और उनके दरबार में दुआएँ करने को दर्शाती है। शायर कहता है कि हम हमेशा आका ﷺ की आमद के नगमे गाते रहेंगे और अपनी जान-ओ-माल उन पर निसार करते रहेंगे, क्योंकि उनका फैज़ ही हमारे दिलों को रोशन करता है।
इस नात में हुज़ूर ﷺ की आमद की खुशी में घरों को किस तरह जगमगाने और गलियों को सजाने का हुक्म दिया गया है?