नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर
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टाइटल : आने वालो ये तो बताओ शहर-ए-मदीना कैसा है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : इशरत गोधरवी
जोड़ा गया : 24 Aug, 2026 07:43 AM IST
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आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है,
सर उन के क़दमों में रख कर, झुक कर जीना कैसा है
देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है,
आँखों को जो ठंडक बख़्शे, गुंबद-ए-ख़ज़रा ऐसा है
आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है
गुंबद-ए-ख़ज़रा के साए में बैठ के तुम तो आए हो,
उस साए में रब के आगे सज्दा करना कैसा है
आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है
मैं भी चूम के आज आया हूँ उन महकती गलियों को,
जो कुछ देखा उन गलियों में, कहीं न देखा ऐसा है
देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है
दिल, आँखें और रूह तुम्हारी लगती है सैराब मुझे,
दर पे उन के बैठ के आब-ए-ज़मज़म पीना कैसा है
आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है
हम मेहमान बने थे उन के, ‘अर्श पे जो मेहमान हुए,
क्यूँ न क़िस्मत पर हो नाज़ाँ, जिन का आक़ा ऐसा है
देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है
दीवानो ! आँखों से तुम्हारी इतना पूछ तो लेने दो,
वक़्त-ए-दु’आ रौज़े पे उन के आँसू बहाना कैसा है
आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है
मिम्बर-ए-पाक-ए-रसूल भी देखा, देखा ख़ास मुसल्ला भी,
हरम शरीफ़ का हर मंज़र ही नज़र में जचता ऐसा है
देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है
वक़्त-ए-रुख़्सत दिल को अपने छोड़ वहाँ तुम आए हो,
ये बतलाओ, इशरत ! उन के घर से बिछड़ना कैसा है
आने वालो ! ये तो बताओ, शहर-ए-मदीना कैसा है
वापस आएँ दिल नहीं करता छोड़ के उन की चौखट को,
जान भी दे दें उन के दर पर, दिल में आता ऐसा है
देख के जिस को जी नहीं भरता, शहर-ए-मदीना ऐसा है
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यह नात हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शान, शहर-ए-मदीना की रूहानी ख़ूबसूरती और मदीना-ए-मुनव्वर की हाज़िरी के तड़पते हुए जज़्बात का एक बेहद दिलकश बयान है।
इस नात में मदीना मुनव्वर के सफर और वहाँ के रूहानी नज़ारों का दिल को छू लेने वाला ज़िक्र है। गुंबद-ए-ख़ज़रा का सुकून, आँखों को ठंडक देने वाले मनाज़िर और मदीने की गलियों से जुड़ाव इंसान की रूह को तृप्त कर देता है, जहाँ से वापस आने का दिल कभी नहीं करता।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| शहर-ए-मदीना | मदीना शरीफ का पवित्र शहर |
| गुंबद-ए-ख़ज़रा | पैगंबर साहब के रोज़ा-ए-मुबारक का सब्ज़ (हरा) गुंबद |
| सैराब | तृप्त, प्यास बुझा हुआ, रूहानी तौर पर तर-बतर |
| आब-ए-ज़मज़म | ज़मज़म कुएँ का पवित्र पानी |
| नाज़ाँ | गर्व महसूस करने वाला, कृतज्ञ |
| वक़्त-ए-रुख़्सत | विदा होने या वापस लौटने का समय |
शायर 'इशरत' ने इस नात के ज़रिए मदीना-ए-मुनव्वर की बेपनाह मोहब्बत और वहाँ की हाज़िरी के अहसास को बयां किया है। हुज़ूर ﷺ के दरबार की पाकीज़री, वहाँ के रोज़ा-ए-अतहर पर आँखें नम होना और मदीने की चौखट को छोड़कर आने पर होने वाले दर्द का बहुत ही असरदार और रूहानी नक़्शा खींचा गया है।
नात में शायर ने शहरे-मदीना की उन गलियों और रोज़ा-ए-रसूल ﷺ पर हाज़िरी के वक़्त आशिक के दिल की किस कैफियत को सबसे ज़्यादा दर्दनाक और हसीन क़रार दिया है?