क़ुर्बान मैं उनकी बख़्शिश के मक़सद भी ज़बाँ पर आया नहीं
- 6 महीने पहले fiber_manual_record 581 बार देखा गया
टाइटल : नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर
श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : मोलाना मोहम्मद इमरान कासमी मुरादाबादी
नातख्वान/कलाकार: मोलाना मोहम्मद इमरान कासमी मुरादाबादी
जोड़ा गया : 24 Aug, 2026 08:35 AM IST
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नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर,
ये मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है?
कभी वज़्ज़ुहा और कभी वलीन कहना,
ये उल्फ़त नहीं तो फिर और क्या है?
नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर,
ये मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है?
वो पत्थर के टुकड़ों से कलमा पढ़ाना,
दरख़्तों का ख़ुद चल के पैग़ाम लाना,
इशारे से सूरज को वापस बुलाना,
ये अज़मत नहीं है तो फिर और क्या है?
नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर,
ये मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है?
उन्हीं के सदक़े में चलता ज़माना,
जो फ़ाक़ाकशों को खिलाता है खाना,
मगर पेट पर अपने बाँधे हैं पत्थर,
ये फ़ज़ीलत नहीं है तो फिर और क्या है?
नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर,
ये मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है?
सताती बूढ़ी, नबी जब गुज़रते,
सताते थे मुशरिक, वो सज्दा जब करते,
मगर बद्दुआ से गुरेज़ ही रहना,
शराफ़त नहीं है तो फिर और क्या है?
नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर,
ये मोहब्बत नहीं है तो फिर और क्या है?
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यह नात हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की शान-ए-अक़दस, अल्लाह तआला की उनसे अगाध मोहब्बत (मे'राज का सफर), उनके करिश्माई मो'जिज़ात और उनके बुलंद अखलाक का एक बेहद दिलकश और रूहानी बयान है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि अल्लाह तआला का नबी ﷺ को आसमान (फ़लक) से भी ऊपर मे'राज पर बुलाना और पवित्र कुरआन में उनकी कसम खाना (वज़्ज़ुहा और वलीन) इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि خالق और مخلوق के दरमियान यह मोहब्बत की इंतिहा है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| फ़लक | आसमान / आकाश |
| वज़्ज़ुहा / वलीन | कुरआन की मुकद्दस आयतें (सूरह अज़-जुहा और सूरह अल-लैल) जिनमें कसम खाई गई है |
| मो'जिज़ा (अज़मत) | चमत्कार / खुदा की तरफ से होने वाला करिश्मा |
| फ़ाक़ाकश | भूखे रहने वाले (जो खुद भूखे रहकर दूसरों को खाना खिलाएं) |
| गुुरेज़ | बचना / परहेज़ करना (यहाँ बद्दुआ देने से बचने के अर्थ में) |
| शराफ़त | उत्कृष्ट आचरण, भलमनसाहत और बुलंद किरदार |
इस नात में शायर ने नबी-ए-करीम ﷺ के मक़ाम-ए-बुलंद को बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में उजागर किया है। मे'राज का सफर, पत्थरों और दरख़्तों का कलमा पढ़ना, सूरज का लौट आना, खुद भूखे रहकर दूसरों की मदद करना और दुश्मनों के जुल्मों पर भी उनके हक में बद्दुआ न माँगना—यह सब उनके बेमिसाल सब्र, रहमत और अजीम शराफ़त की ला-ज़वाल दास्ताँ है।
नात में नबी ﷺ के किन अज़ीम मो'जिज़ात (चमत्कारों) और किस सब्र-ओ-शराफ़त का ज़िक्र किया गया है जब उन्हें दुश्मनों की तरफ़ से तकलीफ़ दी गई?