क़ुर्बान मैं उनकी बख़्शिश के मक़सद भी ज़बाँ पर आया नहीं
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टाइटल : मेरी उल्फत मदीने से यूं ही नहीं
श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अल्लामा निसार अली उजागर मुनीर क़सुरी
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी लाइबा फातिमा ज़ोहैब अशरफ़ी
जोड़ा गया : 02 Sep, 2025 08:15 AM IST
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मेरी उल्फत मदीने से यूं ही नहीं,
मेरे आक़ा का रोज़ा मदीने में है
मैं मदीने की जबनीब ना कैसे खिंचू,
मेरा दीन और दुनिया मदीने में है
मेरी उल्फत मदीने से यूं ही नहीं,
मेरे आक़ा का रोज़ा मदीने में है
अर्श-ए-आज़म पे जिसकी बड़ी शान है,
रोज़ा-ए-मुस्तफ़ा जिसकी पहचान है,
जिसकी हम-पल्ला कोई मोहल्ला नहीं,
एक ऐसा मोहल्ला मदीने में है
ये शहर-ए-मुस्तफा है, मदीना करीम है,
सब को निभा रहा है, मदीना करीम है
क्यों ना करीम हो ये के, आका करीम का,
मकान जो बन गया है, मदीना करीम है,
सब को निभा रहा है, मदीना करीम है
फैला के अपनी बहे, बुलाता है बार बार,
रहमत का दायरा है, मदीना करीम है
मेरी उल्फत मदीने से यूं ही नहीं,
मेरे आक़ा का रोज़ा मदीने में है
फिर मुझे मौत का कोई खतरा ना हो,
मौत क्या जिंदगी की भी परवा ना हो,
काश सरकार मुझ से कहे एक बार,
अब तेरा जीना मरना मदीने में है,
लब खोलने से पहले ही आका ने दे दिया
मेरा भी तजुरबा है, मदीना करीम है,
सब को निभा रहा है, मदीना करीम है
है ज़र्फ लाजवाब, करम बे-मिसाल है,
मुझ जैसा आ गया है, मदीना करीम है,
क्या मंगू मुस्तफा से, उजागर दिली मुराद,
सब कुछ तो दे दिया है, मदीना करीम है
काश सरकार मुझ से कहे एक बार,
अब तेरा जीना मरना मदीने में है
मेरी उल्फत मदीने से यूं ही नहीं,
मेरे आक़ा का रोज़ा मदीने में है
सरवर-ए-दो-जहाँ से दुआ है मेरी!
हां यही चश्में तर इल्तेजा है मेरी,
उनकी फेहरिस्त में, मेरा भी नाम हो,
जिनका रोज़ आना जाना मदीने में है,
फरियाद उम्मति जो करे हाल ज़ार में,
मुमकिन नहीं कि खैर-ऐ-बशर को खबर न हो
जब नज़र सु-ए-तैयबा रवना हुई,
साथ दिल भी गया, साथ जान भी गयी,
मैं, मुनीर! अब रहूंगा यहां किस लिए,
मेरा सारा आसासा मदीन में है
मेरी उल्फत मदीने से यूं ही नहीं,
मेरे आक़ा का रोज़ा मदीने में है
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यह नात मदीना मुनव्वरा की बेपनाह मुहब्बत और वहाँ की हाज़िरी की तड़प का एक भावुक इज़हार है। इसमें बताया गया है कि एक आशिक़-ए-रसूल के लिए मदीना सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि उसके दीन और दुनिया का केंद्र है।
इन पंक्तियों का मक़सद यह स्पष्ट करना है कि मदीना 'करीम' (दयालु) है जो हर बेसहारा को पनाह देता है। शायर की दिली ख्वाहिश है कि काश उसे मदीने में मौत नसीब हो जाए, क्योंकि जब उसकी जान और दिल (असासा) पहले ही वहाँ जा चुके हैं, तो इस दुनिया में रहने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है।
| शब्द | अर्थ (Hindi/English) |
|---|---|
| उल्फत | प्रेम / मुहब्बत (Love) |
| हम-पल्ला | बराबर का / समान (Equal/Match) |
| करीम | दयालु / करम करने वाला (Generous) |
| ज़र्फ | क्षमता / धैर्य (Capacity/Endurance) |
| चश्में तर | नम आँखें / आँसू भरी आँखें (Tearful eyes) |
| इल्तेजा | प्रार्थना / गुज़ारिश (Request) |
| खैर-ऐ-बशर | मानव जाति में सबसे श्रेष्ठ (नबी ﷺ) |
| असासा | पूँजी / संपत्ति (Assets/Belongings) |
इस कलाम का सार यह है कि मदीना वह पावन स्थान है जहाँ अर्श से भी ऊँची शान रखने वाले नबी ﷺ विश्राम कर रहे हैं। शायर का मानना है कि वहाँ माँगने से पहले ही मुरादें पूरी हो जाती हैं क्योंकि वहाँ के आका बेहद करीम हैं। अंत में, वह दुआ करता है कि उसका नाम उन खुशनसीबों की सूची (फेहरिस्त) में शामिल हो जाए जिन्हें रोज़ नबी के दर पर हाज़िरी का शर्फ़ हासिल है।
नात के आखिर में शायर "मुनीर" ने मदीने की तरफ रवाना होने वाली नज़र के बारे में क्या कहा है, और उनका "सारा असासा" (पूंजी/संपत्ति) कहाँ है?