क़ुर्बान मैं उनकी बख़्शिश के मक़सद भी ज़बाँ पर आया नहीं
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टाइटल : बख़्शिश का सिलसिला है ये रमज़ान करीम है
श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 12 Mar, 2024 11:00 AM IST
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बख़्शिश का सिलसिला है, ये रमज़ान करीम है,
रहमत का आसरा है, ये रमज़ान करीम है।
जो माँगो मिल रहा है, ये रमज़ान करीम है,
ये फ़ैज़ और सखा है, ये रमज़ान करीम है।
ऐ बे-कसो, ऐ मुजरिमो, ऐ आसियों सुनो,
ग़फ़्फ़ार-किब्रिया है, ये रमज़ान करीम है।
हर लम्हा बरसती हैं जो रहमत की बरसिशें,
ये रब का महीना है, ये रमज़ान करीम है।
बख़्शा गया जो आमदे रमज़ान पर खुश हुआ,
क्या पाया मर्तबा है, ये रमज़ान करीम है।
इसको मिला शरफ़ है नुज़ूले क़ुरान का,
जो रहमतों-शिफ़ा है, ये रमज़ान करीम है।
शैतान है क़ैद, न दोज़ख़ का कोई डर,
दर-ए-ख़ुल्द का भी वादा, ये रमज़ान करीम है।
तुझको नसीब होगी बहार-ए-हरम भी अब,
तूने जो पा लिया है, ये रमज़ान करीम है।
सय्यद! खुदा का शुक्र अदा कर के ज़ीस्त में,
बारे-दिगर मिला है, ये रमज़ान करीम है।
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यह नज़्म माहे-रमज़ान की बरकतों और अल्लाह की असीम दयालुता का वर्णन करती है। इसमें बताया गया है कि यह महीना गुनहगारों की माफ़ी और दुआओं की क़बूलियत का सबसे बड़ा अवसर है।
शायर कहता है कि रमज़ान का महीना अल्लाह की सख़ावत (उदारता) का द्वार है, जहाँ हर माँगने वाले की मुराद पूरी होती है। इस महीने में क़ुरान का नुज़ूल (अवतरण) हुआ और जन्नत के दरवाज़े खोल दिए गए हैं, ताकि बेबस और गुनहगार लोग तौबा करके ख़ुदा की रहमत पा सकें।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बख़्शिश | क्षमा या मुक्ति |
| फ़ैज़ और सखा | लाभ और उदारता |
| आसियों | गुनहगारों (पापियों) |
| ग़फ़्फ़ार | बहुत क्षमा करने वाला (अल्लाह) |
| नुज़ूले क़ुरान | क़ुरान का अवतरण |
| दर-ए-ख़ुल्द | स्वर्ग का दरवाज़ा |
| ज़ीस्त | जीवन / ज़िंदगी |
| बारे-दिगर | एक बार फिर / दोबारा |
इस कलाम का सार यह है कि रमज़ान अल्लाह का वह अनमोल तोहफा है जिसमें इबादत का फल कई गुना बढ़ जाता है और शैतान को क़ैद कर दिया जाता है। शायर अल्लाह का शुक्र अदा करता है कि जीवन में एक बार फिर यह पाक महीना नसीब हुआ है, ताकि हम अपनी आख़िरत (परलोक) संवार सकें।
कलाम के आखिर में शायर "सैय्यद" ने किस बात पर खुदा का शुक्र अदा किया है और उन्हें अपनी ज़िंदगी ("ज़ीस्त") में क्या चीज़ दोबारा ("बारे दिगर") मिली है?