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बख़्शिश का सिलसिला है ये रमज़ान करीम है Lyrics In हिन्दी

(बख़्शिश का सिलसिला है ये रमज़ान करीम है, रहमत का आसरा है ये रमज़ान करीम है)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : बख़्शिश का सिलसिला है ये रमज़ान करीम है

श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात

नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात

जोड़ा गया : 12 Mar, 2024 11:00 AM IST

बार देखा गया : 516

Time to read: 2 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

बख़्शिश का सिलसिला है, ये रमज़ान करीम है,
रहमत का आसरा है, ये रमज़ान करीम है।

जो माँगो मिल रहा है, ये रमज़ान करीम है,
ये फ़ैज़ और सखा है, ये रमज़ान करीम है।

ऐ बे-कसो, ऐ मुजरिमो, ऐ आसियों सुनो,
ग़फ़्फ़ार-किब्रिया है, ये रमज़ान करीम है।

हर लम्हा बरसती हैं जो रहमत की बरसिशें,
ये रब का महीना है, ये रमज़ान करीम है।

बख़्शा गया जो आमदे रमज़ान पर खुश हुआ,
क्या पाया मर्तबा है, ये रमज़ान करीम है।

इसको मिला शरफ़ है नुज़ूले क़ुरान का,
जो रहमतों-शिफ़ा है, ये रमज़ान करीम है।

शैतान है क़ैद, न दोज़ख़ का कोई डर,
दर-ए-ख़ुल्द का भी वादा, ये रमज़ान करीम है।

तुझको नसीब होगी बहार-ए-हरम भी अब,
तूने जो पा लिया है, ये रमज़ान करीम है।

सय्यद! खुदा का शुक्र अदा कर के ज़ीस्त में,
बारे-दिगर मिला है, ये रमज़ान करीम है।

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह नज़्म माहे-रमज़ान की बरकतों और अल्लाह की असीम दयालुता का वर्णन करती है। इसमें बताया गया है कि यह महीना गुनहगारों की माफ़ी और दुआओं की क़बूलियत का सबसे बड़ा अवसर है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

शायर कहता है कि रमज़ान का महीना अल्लाह की सख़ावत (उदारता) का द्वार है, जहाँ हर माँगने वाले की मुराद पूरी होती है। इस महीने में क़ुरान का नुज़ूल (अवतरण) हुआ और जन्नत के दरवाज़े खोल दिए गए हैं, ताकि बेबस और गुनहगार लोग तौबा करके ख़ुदा की रहमत पा सकें।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ
बख़्शिशक्षमा या मुक्ति
फ़ैज़ और सखालाभ और उदारता
आसियोंगुनहगारों (पापियों)
ग़फ़्फ़ारबहुत क्षमा करने वाला (अल्लाह)
नुज़ूले क़ुरानक़ुरान का अवतरण
दर-ए-ख़ुल्दस्वर्ग का दरवाज़ा
ज़ीस्तजीवन / ज़िंदगी
बारे-दिगरएक बार फिर / दोबारा

सारांश (Summary)

इस कलाम का सार यह है कि रमज़ान अल्लाह का वह अनमोल तोहफा है जिसमें इबादत का फल कई गुना बढ़ जाता है और शैतान को क़ैद कर दिया जाता है। शायर अल्लाह का शुक्र अदा करता है कि जीवन में एक बार फिर यह पाक महीना नसीब हुआ है, ताकि हम अपनी आख़िरत (परलोक) संवार सकें।

कलाम के आखिर में शायर "सैय्यद" ने किस बात पर खुदा का शुक्र अदा किया है और उन्हें अपनी ज़िंदगी ("ज़ीस्त") में क्या चीज़ दोबारा ("बारे दिगर") मिली है?

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