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ए हवाओ इधर आओ के ज़रा जी बहेले Lyrics In हिन्दी

(ए हवाओ इधर आओ के ज़रा जी बहेले, उनका पैगाम सुनाओ के ज़रा जी बहेले)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : ए हवाओ इधर आओ के ज़रा जी बहेले

श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स) नज़्म के बोल (लीरिक्स)

जोड़ा गया : 30 Aug, 2025 03:28 PM IST

बार देखा गया : 2.3K

Time to read: 2 min read

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ए हवाओ इधर आओ के ज़रा जी बहेले,
उनका पैगाम सुनाओ के ज़रा जी बहेले

दिल की आवाज़ समात ऐ नबी फरमाओ,
रुख से अब पर्दा हटाओ के ज़रा जी बहेले

तीरगी कुफ्र की फिर बढ़ने लगी है हरसू,
बज़्म-ए-मिलाद सजाओ के ज़रा जी बहेले

उनका पैगाम सुनाओ के ज़रा जी बहेले

ऐ हवाओ बू-ए ज़ुल्फे शाहे बतहा लेकर,
मुझको एक बार सुंघाओ के जरा जी बहेले

उनका पैगाम सुनाओ के ज़रा जी बहेले

मुज़तरिब होता है गर दिल तो निगाहों में तुम,
मंज़र-ऐ-तैबा बसाओ के ज़रा जी बहेले

उनका पैगाम सुनाओ के ज़रा जी बहेले

तिस्ना लब हो के में आया हू शफी-ए-मेहशर,
जाम-ए-कौसर का पिलाओ के ज़रा जी बहेले

ए हवाओ इधर आओ के ज़रा जी बहेले,
उनका पैगाम सुनाओ के ज़रा जी बहेले

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह नात एक आशिक-ए-रसूल की तड़प और मदीना की यादों का एक बेहद भावुक चित्रण है। इसमें शायर हवाओं से हुज़ूर ﷺ का संदेश लाने की विनती कर रहा है ताकि बेकरार दिल को सुकून मिल सके।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

शायर हवाओं से गुज़ारिश करता है कि वे मदीना की गलियों से गुज़रकर आएँ और नबी ﷺ की यादों की खुशबू साथ लाएँ। जब भी दुनिया में बुराई और अंधेरा (कुफ्र) बढ़ने लगे, तो मिलाद की महफिलें सजाकर और तैबा (मदीना) के मंज़र को याद करके ही दिल को शांति दी जा सकती है।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्द (Word)अर्थ - Meaning (English/Hindi)
समात (Samaat)Hearing / सुनने की शक्ति
तीरगी (Tirgi)Darkness / अंधेरा
हरसू (Harsu)In all directions / हर तरफ
बू-ए-ज़ुल्फ (Bu-ae-Zulf)Scent of Hair / बालों की खुशबू
मुज़तरिब (Muztarib)Restless / बेचैन या व्याकुल
तिस्ना लब (Tisna Lab)Thirsty / प्यासा

सारांश (Summary)

इस कलाम का सार यह है कि एक मोमिन का दिल दुनियावी परेशानियों के बीच केवल नबी ﷺ के ज़िक्र और उनकी शफ़ाअत (सिफारिश) से ही सुकून पाता है। शायर अपनी रूह की प्यास बुझाने के लिए जाम-ए-कौसर की उम्मीद रखता है और मदीना की हवाओं में अपने महबूब की खुशबू तलाश करता है।

नात के आखिरी मिसरों में शायर ने खुद को "तिश्ना लब" (प्यासा) कहते हुए "शफी-ए-महशर" से किस चीज़ की दरख्वास्त की है?

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