नबी को बुलाना फ़लक से भी ऊपर
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टाइटल : रुख़ दिन है या महर-ए-समा ये भी नहीं वो भी नहीं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी लाइबा फातिमा ओवैस रज़ा कादरी वजाहत वास्ति
जोड़ा गया : 17 Aug, 2026 08:54 AM IST
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रुख़ दिन है या महर-ए-समा, ये भी नहीं वो भी नहीं
शब ज़ुल्फ़ या मुश्क-ए-ख़ता, ये भी नहीं वो भी नहीं
मुमकिन में ये क़ुदरत कहाँ, वाजिब में अब्दियत कहाँ
हैराँ हूँ ये भी है ख़ता, ये भी नहीं वो भी नहीं
हक़ ये कि हैं अब्द-ए-इलाह और आलम-ए-इमकाँ के शाह
बरज़ख़ हैं वो सिर्र-ए-ख़ुदा, ये भी नहीं वो भी नहीं
बुलबुल ने गुल उनको कहा, क़ुमरी ने सर्व-ए-जाँफ़िज़ा
हैरत ने झुँझला कर कहा, ये भी नहीं वो भी नहीं
ख़ुरशीद था किस ज़ोर पर, क्या बढ़ के चमका था क़मर
बे-पर्दा जब वो रुख़ हुआ, ये भी नहीं वो भी नहीं
डर था कि इसियाँ की सज़ा अब होगी या रोज़-ए-जज़ा
दी उनकी रहमत ने सदा, ये भी नहीं वो भी नहीं
कोई है नाज़ाँ ज़ुह्द पर या हुस्न-ए-तौबा है सिपर
याँ है फ़क़त तेरी अता, ये भी नहीं वो भी नहीं
दिन लह्व में खोना तुझे, शब सुबह तक सोना तुझे
शर्म-ए-नबी, ख़ौफ़-ए-ख़ुदा, ये भी नहीं वो भी नहीं
रिज़्क़-ए-ख़ुदा खाया किया, फ़रमान-ए-हक़ टाला किया
शुक्र-ए-करम, तर्स-ए-सज़ा, ये भी नहीं वो भी नहीं
है बुलबुल-ए-रंगीं रज़ा या तूतिया नग़्मा-सरा
हक़ ये कि वासिफ़ है तिरा, ये भी नहीं वो भी नहीं
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यह कलाम आला हज़रत امام احمد رضا خان کی ایک بہت ہی لاجواب اور فلسفیانہ ناत है, जिसमें हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस चेहरे, उनके मर्तबे और उनकी अज़मत को आम इंसानी तशबीहों से बहुत बुलंद बताया गया है।
इस नात में शायर ने हुज़ूर ﷺ के हुस्न की तुलना सूरज, चाँद या फूलों से करने के बाद खुद ही इन सभी तशबीहों को नकार दिया है, क्योंकि आपकी शान और आपका नूर किसी भी ज़मीनी या आसमानी चीज़ से परे है। आप खालिक (अल्लाह) और मखलूक (संसार) के बीच एक ऐसा बेहतरीन वसीला (बरज़ख़) हैं जिनकी हस्ती बे-मिसाल है।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| महर-ए-समा | आसमान का सूरज |
| मुश्क-ए-ख़ता | ख़ोतन की कस्तूरी (एक बेहद खुशबूदार चीज़) |
| मुमकिन | मखलूक / संसार (संभावित सत्ता) |
| वाजिब | वाजिबुल वजूद (अल्लाह की ज़ात) |
| अब्दियत | बंदगी या दासता |
| बरज़ख़ | दो चीज़ों के बीच की कड़ी या परदा |
| सिर्र-ए-ख़ुदा | खुदा का गुप्त रहस्य / राज़ |
| क़ुमरी | एक प्रकार की सुंदर पक्षी (फाख्ता) |
| रोज़-ए-जज़ा | क़यामत का दिन / हिसाब-किताब का दिन |
| सिपर | ढाल / सुरक्षा |
इस नात का सार यह है कि हुज़ूर ﷺ की शान और उनका हुस्न तमाम इंसानी तसव्वुर से बहुत ऊपर है। जहाँ लोग अपनी इबादत या नेकियों के घमंड में रहते हैं, वहीं शायर यह मानता है कि हमारी बख्शिश का एकमात्र सहारा सिर्फ अल्लाह की अता और नबी ﷺ की रहमत है। अपने गुनाहों और غفلت (गाफ़िलियों) के बावजूद, हमें सिर्फ और सिर्फ Huzoor ﷺ के दरबार से ही उम्मीद وابستہ (वाबस्ता) रखनी चाहिए।
इस कलाम में शायर ने हुज़ूर ﷺ के मुक़द्दस चेहरे (रुख़) की तुलना शुरू में किन दो रोशन चीज़ों से की है, जिसे बाद में उन्होंने नकार (ये भी नहीं वो भी नहीं) दिया?