रुख़ दिन है या महर-ए-समा ये भी नहीं वो भी नहीं
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टाइटल : किस के जलवे की झलक है ये उजाला क्या है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 17 Aug, 2026 08:37 AM IST
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किस के जलवे की झलक है ये उजाला क्या है,
हर तरफ़ दीदए-हैरत-ज़दा तकता क्या है।
माँग मन-माँगी, मुँह-माँगी मुरादें लेगा,
न यहाँ “ना” है, न मंगता से ये कहना “क्या है।”
पंद कड़वी लगे नासेह से, तरश हो ऐ नफ़्स,
ज़हर-ए-इसियाँ में सितमगर तुझे मीठा क्या है।
हम हैं उनके, वो हैं तेरे, तो हुए हम तेरे,
इस से बढ़कर तिरी सम्त और वसीला क्या है।
उनकी उम्मत में बनाया, उन्हें रहमत भेजा,
यूँ न फ़रमा कि तिरा रहम में दावा क्या है।
सदक़ा प्यारे की हया का कि न ले मुझ से हिसाब,
बख़्श बे-पूछे लजाए को लजाना क्या है।
ज़ाहिद उनका, मैं गुनहगार, वो मेरे शाफ़ेअ,
इतनी निस्बत मुझे क्या कम है, तू समझा क्या है।
बे-बसी हो जो मुझे पुर्सिश-ए-आमाल के वक़्त,
दोस्तो! क्या कहूँ उस वक़्त तमन्ना क्या है।
काश फ़रियाद मेरी सुन के ये फ़रमाएँ हुज़ूर,
हाँ कोई देखो, ये क्या शोर है, ग़ोग़ा क्या है।
कौन आफ़त-ज़दा है, किस पे बला टूटी है,
किस मुसीबत में गिरफ़्तार है, सदमा क्या है।
किस से कहता है कि लिल्लाह ख़बर लीजे मेरी,
क्यों है बेताब, ये बेचैनी का रोना क्या है।
इसकी बेचैनी से है ख़ातिर-ए-अक़दस पे मलाल,
बे-कसी कैसी है, पूछो कोई गुज़रा क्या है।
यूँ मलाइक करें मअरूज़ कि इक मुजरिम है,
इस से पुर्सिश है, बता तूने क्या-क्या क्या है।
सामना क़हर का है, दफ़्तर-ए-आमाल हैं पेश,
डर रहा है कि ख़ुदा हुक्म सुनाता क्या है।
आप से करता है फ़रियाद कि या शाह-ए-रुसुल,
बंदा बे-कस है, शहा रहम में वक़्फ़ा क्या है।
अब कोई दम में गिरफ़्तार-ए-बला होता हूँ,
आप आ जाएँ तो क्या ख़ौफ़ है, खटका क्या है।
सुन के ये अर्ज़ मेरी, बहर-ए-करम जोश में आए,
यूँ मलाइक को हो इरशाद, “ठहरना क्या है।”
किस को तुम मौरिद-ए-आफ़ात किया चाहते हो!
हम भी तो आके ज़रा देखें तमाशा क्या है।
उनकी आवाज़ पे कर उठूँ मैं बे-साख़्ता शोर,
और तड़प कर ये कहूँ, अब मुझे परवा क्या है।
लो वो आया मेरा हामी, मेरा ग़मख़्वार-ए-उमम!
आ गई जाँ तन-ए-बेजाँ में, ये आना क्या है।
फिर मुझे दामन-ए-अक़दस में छुपा लें सरवर,
और फ़रमाएँ, “हटो, इस पे तक़ाज़ा क्या है।”
बंदा आज़ाद-शुदा है ये हमारे दर का,
कैसा लेते हो हिसाब, इस पे तुम्हारा क्या है।
छोड़कर मुझ को फ़रिश्ते कहें, महकूम हैं हम,
हुक्म-ए-वाला की न तामील हो, ज़हरा क्या है।
ये समाँ देख के महशर में उठे शोर कि वाह,
चश्म-ए-बद दूर हो, क्या शान है, रुत्बा क्या है।
सदक़े इस रहम के, इस साया-ए-दामन पे निसार,
अपने बंदे को मुसीबत से बचाया क्या है।
ऐ रज़ा, जान-ए-अनादिल तेरे नग़्मों के निसार,
बुलबुल-ए-बाग़-ए-मदीना, तेरा कहना क्या है।
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यह कलाम आला हज़रत امام احمد رضا خان की एक बहुत ही रूहानी और दिल को छू लेने वाली नात है, जिसमें क़यामत के दिन हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत और अपने उम्मती पर आपकी बेपनाह मोहब्बत व रहमत का खूबसूरत नज़ारा पेश किया गया है।
इस कलाम में शायर ने क़यामत के उस पल को बयां किया है जब गुनहगार बंदा अपने आमाल के हिसाब से घबराकर हुज़ूर ﷺ की बारगाह में फरियाद करता है। नबी-ए-करीम ﷺ अपने उम्मती की पुकार सुनकर खुद तशरीफ लाते हैं और फरिश्तों से उसे बचाकर अपनी रहमत के आंचल में छुपा लेते हैं।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| दीदए-हैरत-ज़दा | हैरान और चकित आँखें |
| ज़हर-ए-इसियाँ | गुनाहों का ज़हर |
| शाफ़ेअ | शफ़ाअत (सिफारिश) करने वाले |
| ग़ोग़ा | शोर या हंगामा |
| ख़ातिर-ए-अक़दस | मुक़द्दस (पवित्र) दिल या ज़ात |
| मलाइक़ | फ़रिश्ते (मलक की जमा) |
| ग़मख़्वार-ए-उमम | उम्मत का दर्द बांटने वाले / मददगार |
| अनादिल | बुलबुलें (अंदलीब की जमा) |
इस नात का सार यह है कि आशिक़-ए-रसूल को इस बात का पूरा यकीन है कि मुश्किल वक्त में उसके आका ﷺ उसकी मदद के लिए जरूर आएंगे। जब क़यामत के दिन गुनाहों का हिसाब होगा और सज़ा का खौफ होगा, तब हुज़ूर ﷺ खुद आकर अपने उम्मती को फरिश्तों की गिरफ्त से आज़ाद करा लेंगे और अपनी शफ़ाअत से हमेशा के लिए कामयाब कर देंगे।
क़यामत के दिन आमाल का हिसाब देते वक़्त शायर बेबस होकर किससे फ़रियाद करने और बख़्शिश की उम्मीद कर रहा है?