क़ुर्बान मैं उनकी बख़्शिश के मक़सद भी ज़बाँ पर आया नहीं
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टाइटल : या हय्यू या क़य्यूम
श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: नुसरत फ़तेह अली खान सामी युसूफ
जोड़ा गया : 16 Jan, 2024 08:55 AM IST
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या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
या रहीमू या रहमान!
या आदिलु या मन्नान!
या हाफ़िज़ु या सत्तार!
या वाहिदु या ग़फ़्फ़ार!
या मालिकु या रज़्ज़ाक!
तू ख़ालिक-ए-हर-खल्लाक
हर राज़ तुझे मालूम
हर राज़ तुझे मालूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
बे-मिस्ल है तू, ला-रैब
तू पाक है, तू बे-ऐब
तू ज़ीस्त का है उन्वान
तू साख़िर-ए-हर-उद्वान
तेरी ज़ात है अज़्ज़-ओ-जल
तू हर मुश्किल का हल
हर سمت है तेरी धूम
हर سمت है तेरी धूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
तंज़ील तेरा पैग़ाम
है ख़ास तेरा इनाम
है दर की ये अक्सीर
ईमान इसकी तासीर
है सिलसिला-ए-अहसास
अल-हम्द से ता वन्नास
है साफ़ इसका मफ़हूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
रहमत की निगाहों का इशारा माँगो
दुनिया से कोई शै न ख़ुदारा माँगो
दुनिया की वफ़ा झूट, सहारे हैं फ़रेब
अल्लाह से अल्लाह का सहारा माँगो
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
मंसब की करो चाह, न सर्वत माँगो
तुम अहल-ए-मोहब्बत हो, मोहब्बत माँगो
हर हाल में थमे हुए दामान-ए-रज़ा
अल्लाह से अल्लाह की रहमत माँगो
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
कर दिल को अता सोज़-ए-दवामी या रब!
हर सांस हो रहमत की पैग़ामी या रब!
औरोंग-ओ-शाही की नहीं हाजत मुझको
काफ़ी है मुहम्मद की ग़ुलामी या रब!
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
वो नबियों का सरदार, अल्लाह!
हर आलम का मुख़्तार, अल्लाह!
तू साज़ है, वो आवाज़, अल्लाह!
तू राज़, वो महरम-ए-राज़, अल्लाह!
तू लफ़्ज़ है, वो फ़रहंग
तू हाकिम है, वो औरंग
तू लाज़िम, वो मलज़ूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
आदत है मेरी हद से गुज़रना या रब
आता ही नहीं मुझको ठहरना या रब
हरफ़-ए-गदा माने करम पर तेरे
शर्मिंदा सरे-हश्र में करना या रब
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
मैं आज़िज़ ख़ाक-बशर, अल्लाह!
तू मालिक-ए-बह्र-ओ-बर, अल्लाह!
मैं बंदा-ए-पुर्तक़्सीर, अल्लाह!
तेरे हाथ मेरी तक़दीर, अल्लाह!
मैं अह्क़र तेरी ख़ाक, तू वारिस-ए-हफ्त-अफ़्लाक
तू हाकिम, मैं महकूम — तू हाकिम, मैं महकूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
मैं नक़्श हूँ, तू नक़्क़ाश, अल्लाह!
तू मुनीम, मैं किल्लाश, अल्लाह!
मैं आबिद, तू माबूद, अल्लाह!
मैं साजिद, तू मसजुद, अल्लाह!
मैं जिस्म हूँ और तू दम्म
तेरा ज़िक्र इलाज-ए-ग़म्म
क्यों दिल हो मेरा मग़्मूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
इस दौर में हर इंसान, अल्लाह!
बे-बह्र है और बे-जान, अल्लाह!
हैं दीद-ओ-दिल बे-नूर, अल्लाह!
मंज़िल से अभी हैं दूर, अल्लाह!
ऐसे में मेरे माबूद
है फ़ज़्ल तेरा मक़्सूद
रख इसे न अब महरूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
मैं क्या हूँ? मैं किस शै की तलाफ़ी चाहूँ? या रब!
क्या बात मैं फ़ितरत के मुनाफ़ी चाहूँ? या रब!
कुछ पास नहीं अश्क-ए-निदामत के सिवा
किस मुँह से गुनाहों की मुआफ़ी चाहूँ?
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
मेरे दिल-ए-गुमराह ने मारा मुझको, या रब!
दरकार है रहमत के इशारा मुझको, या रब!
शर्मिंदा न करना सरे-मह्शर, या रब!
तेरे ही करम का है सहारा मुझको
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
तेरी ज़ात याम-ए-इकराम, अल्लाह!
मेरा ज़र्फ़ है ज़र्फ़-ए-ख़ाम, अल्लाह!
तू मालिक, मैं मज़बूर, अल्लाह!
तू नूर है, और मैं तूर, अल्लाह!
या मंज़िल-ए-इंस-ओ-जान
कर मुझ पे ये एहसान
मेरा जाग उठे मक़सूम
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
जाऊँ तो कहाँ जाऊँ, तेरे दर के सिवा? या रब!
तस्कीन कहाँ पाऊँ, तेरे दर के सिवा? या रब!
कौनैन पे है तेरे करम का साया
दामान कहाँ फैलाऊँ, तेरे दर के सिवा?
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
या हय्यू! या क़य्यूम!
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यह हम्द अल्लाह की अज़मत और बंदे की बेबसी का एक गहरा और भावपूर्ण वर्णन है, जिसमें केवल ईश्वर की सत्ता को ही अंतिम सत्य और सहारा माना गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि अल्लाह "हय्यू" (सदैव जीवित) और "क़य्यूम" (सबको थामने वाला) है, जिसके सिवा कोई इबादत के लायक नहीं। शायर कहता है कि दुनिया के रिश्ते और वादे झूठे हैं; असली सुकून और मंज़िल केवल अल्लाह की रहमत और उसके रसूल ﷺ की गुलामी में ही छिपी है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ला-रैब | जिसमें कोई शक न हो (बेशक) |
| मंसब | पद या ओहदा (Status/Rank) |
| सर्वत | धन-दौलत (Wealth) |
| अहक़र | अत्यंत तुच्छ या छोटा (Humble self) |
| तलाफ़ी | क्षतिपूर्ति या भरपाई (Compensation) |
| अश्क-ए-निदामत | शर्मिंदगी या पछतावे के आँसू |
| मक़सूम | भाग्य या नसीब (Destiny) |
| तस्कीन | शांति या सुकून (Peace/Comfort) |
इस कलाम का सार यह है कि मनुष्य अपनी फितरत से गुनहगार है और उसके पास ईश्वर को दिखाने के लिए पछतावे के आँसुओं के सिवा कुछ नहीं। शायर अल्लाह से प्रार्थना करता है कि उसे दुनिया की दिखावटी चमक के बजाय अपनी मोहब्बत और रहमत से नवाज़े, क्योंकि कयामत के दिन केवल उसका करम ही एकमात्र सहारा होगा।
शायर ने "अल्लाह से अल्लाह का सहारा माँगो" क्यों कहा है और दुनिया के सहारों को क्या नाम दिया है?