क़ुर्बान मैं उनकी बख़्शिश के मक़सद भी ज़बाँ पर आया नहीं
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टाइटल : वोही रब है जिसने तुझको हमा-तन करम बनाया
श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Aug, 2023 02:31 PM IST
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वोही रब है जिसने तुझको हमा-तन करम बनाया,
हमें भीख माँगने को तेरा आस्तान बताया,
तुझे हाम्द है खुदाया, तुझे हाम्द है खुदाया
तुम्हीं हाकिमे बराया, तुम्हीं क़ासिमे अता किया,
तुम्हीं दाफ़े-ए बुलाया, तुम्हीं शाफी-ए ख़ताया,
कोई तुम सा कौन आया, कोई तुम सा कौन आया
वो कुँवारी पाक मरियम, वो नफ़ख़तु फ़ीही का दम,
है अजब निशाने आज़म मगर आमीना का जाया,
वोही सब से अफ़ज़ल आया, वोही सब से अफ़ज़ल आया
यही बोले सिदरा वाले, चमन-ए जहान के थाले,
सभी मैंने छाँ डालें तेरे पाए का न पाया,
तुझे यक ने यक बनाया, तुझे यक ने यक बनाया
तुझे हाम्द है खुदाया, तुझे हाम्द है खुदाया
फा इज़ा फरग़्ता फ़न्सब ये मिला है तुमको मंसब,
जो ग़दा बना चुके अब, उठो वक़्ते बख़्शिश आया,
करो क़िस्मते अता किया, करो क़िस्मते अता किया
वा इला अल्लाही फ़रग़ब करो अर्श सब के मतलब,
कि तुम्हीं को तक्ते हैं सब, करो उन पर अपना साया,
बनो शाफी-ए ख़ताया, बनो शाफी-ए ख़ताया
अरे ऐ खुदा के बंदो, कोई मेरे दिल को ढूँढो,
मेरे पास था अभी तो, अभी क्या हुआ खुदाया,
ना कोई गया ना आया, ना कोई गया ना आया
हमें ऐ रज़ा तेरे दिल का पता चला बह मुश्किल,
दर रोज़ा के मुकाबिल वो हमें नज़र तो आया,
ये ना पूछ कैसा पाया, ये ना पूछ कैसा पाया
तुझे हाम्द है खुदाया, तुझे हाम्द है खुदाया
कभी खँदा ज़ेरे लब है, कभी गित्या सारी शब है,
कभी ग़म कभी तरब है, न सबब समझ में आया,
ना उसने कुछ बताया, ना उसने कुछ बताया
कभी ख़ाक पर पड़ा है सारे चरख़ ज़ेरे पा है,
कभी पेशे दर खड़ा है, सारे बंदगी झुकाया,
तो क़दम में अरश़ पाया, तो क़दम में अरश़ पाया
कभी वो आपक़ की आतिश, कभी वो टपक़ की बारिश,
कभी वो हुजूम-ए नालिश, कोई जाने अब्र छाया,
बड़ी जोशिशों से आया, बड़ी जोशिशों से आया
तुझे हाम्द है खुदाया, तुझे हाम्द है खुदाया
कभी वो चहक की बुलबुल, कभी वो महक की खुद गुल,
कभी वो लहक की बिलकुल, चमन-ए जिन्नान खिलाया,
गुल-ए क़ुद्स लहलहाया, गुल-ए क़ुद्स लहलहाया
कभी ज़िंदगी के अरमान, कभी मरग़े नव का ख़वाहान,
वो जिया की मरग़ क़ुर्बान, वो मुआ की ज़ीस्त लाया,
कहे रूह ह जिलाया, कहे रूह ह जिलाया
कभी ग़म, कभी आया है, कभी सरद गाह तपाँ है,
कभी ज़ेरे लब फुग़ाँ है, कभी चुप की दम न था,
रुके काम जान दिखाया, रुके काम जान दिखाया
ये तसव्वुराते बातिल, तेरे आगे क्या हैं मुश्किल,
तेरी क़ुदरतें हैं क़ामिल, इन्हें रास्त कर खुदाया,
मैं उन्हें शफ़ी लाया — तुझे हाम्द है खुदाया
तुझे हाम्द है खुदाया, तुझे हाम्द है खुदाया
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह कलाम इमाम अहमद रज़ा खान 'आला हज़रत' द्वारा रचित है, जिसमें अल्लाह की प्रशंसा (हाम्द) के साथ हुज़ूर ﷺ की बेमिसाल अज़मत और उनके शफ़ी (सिफ़ारिश करने वाला) होने का ज़िक्र है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि अल्लाह ने अपने महबूब ﷺ को पूरी तरह 'करम' (दया) का स्वरूप बनाया है और हम ज़रूरत मंदों को उनके दर की चौखट दिखाई है। सिदरा-तुल-मुंतहा के फ़रिश्ते (जिब्राईल अ.स.) भी गवाही देते हैं कि पूरी कायनात तलाश करने के बाद भी हुज़ूर ﷺ के रुतबे जैसा कोई दूसरा नहीं मिला।
| शब्द | अर्थ (हिंदी / English) |
|---|---|
| हमा-तन | पूरी तरह से / Completely |
| आस्तान | चौखट या दरबार / Threshold |
| हाकिमे बराया | सृष्टि के शासक / Ruler of Creation |
| शाफी-ए ख़ताया | गुनाहों की माफ़ी कराने वाले / Intercessor of sins |
| अफ़ज़ल | सर्वश्रेष्ठ / Superior |
| ग़दा | भिखारी या मंगता / Beggar |
कलाम का सार यह है कि नबी पाक ﷺ ही अल्लाह की अता से दुनिया के दुखों को दूर करने वाले और गुनाहगारों की बख़्शिश का ज़रिया हैं। अल्लाह ने उन्हें वह मकाम दिया है जहाँ वह क़िस्मतें बाँटते हैं। अंत में शायर 'रज़ा' अपनी कैफियत बताते हैं कि उनका दिल हुज़ूर ﷺ के रौज़ा-ए-अनवर के सामने इश्क़ में खो गया है।
शायर ने 'सिदरा वाले' (हज़रत जिब्राईल अ.स.) के हवाले से हुज़ूर ﷺ की अज़मत के बारे में क्या कहा है?