क़ुर्बान मैं उनकी बख़्शिश के मक़सद भी ज़बाँ पर आया नहीं
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टाइटल : तैबा है हमारा तैबा है हमारा
श्रेणी (कटेगरी) : हम्द के बोल (लीरिक्स) कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अली हैदर फ़ैज़ी लखनपुरी
नातख्वान/कलाकार: अली हैदर फ़ैज़ी लखनपुरी
जोड़ा गया : 12 Mar, 2024 10:49 AM IST
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तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
दीवाने लगे कहने दिल ओ जान से प्यारा,
बहता है जहाँ चारों तरफ़ नूर का धारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
है सह्र-ए-मदीना में अजब कैफ़ का आलम,
रहमत की वहाँ होती है बरसात झम झम,
आराम जहाँ करते हैं सुलतान-ए-दो आलम,
होता है वहाँ चार सू जन्नत का नज़ारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
बु-ज़ाहेल की मुट्ठी में है क्या चीज़ बता दे,
और आसमान के चाँद को दो टुकड़े बना दे,
बेजान कंकड़ों को भी जो कलमा पढ़ा दे,
जिस सह्र में चमका है मुक़द्दर का सितारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
सरकार की आमद पे है मस्रूर ज़माना,
हर लब पे है आका-ए-दो आलम का तराना,
अब मेरे खुशी झूमकर कहता है दीवाना,
है खुल्दे बड़ी का जहाँ पुर कैफ़ नज़ारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
मुद्दत से जो थी प्यास लगी प्यास बुझाया,
शब्बीर ने करबला को लहू अपना पिलाया,
नाना की शरीयत के लिए सर को कटाया,
जिसको मिला है सिर्फ़ बहत्तर का सहारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
सरकार ने लकड़ी को भी तलवार बनाया,
कदमों के इशारों से दरख़्तों को बुलाया,
डूबे हुए सूरज को भी एक पल में फिराया,
हैदर है वही आमीना बीबी का दुलारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
तैबा है हमारा, तैबा है हमारा
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यह कलाम मदीना मुनव्वरा (तैबा) की अज़मत और वहाँ की रूहानी खूबसूरती को समर्पित है। इसमें हुज़ूर ﷺ के चमत्कारों और मदीना की पवित्र फ़िज़ाओं का बहुत ही भावुक चित्रण किया गया है।
शायर कहता है कि मदीना वह पावन नगरी है जहाँ दोनों जहानों के सुल्तान ﷺ विश्राम कर रहे हैं और जहाँ हर तरफ़ नूर की धारा बहती है। यह वह शहर है जहाँ बेजान कंकड़ों ने कलमा पढ़ा और जहाँ की खातिर इमाम हुसैन (र.अ.) ने दीन को बचाने के लिए कर्बला में अपनी महान कुर्बानी दी।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तैबा | पवित्र/पावन (मदीना का दूसरा नाम) |
| कैफ़ का आलम | रूहानी मस्ती या सुकून का माहौल |
| चार सू | चारों दिशाओं में |
| मस्रूर | प्रसन्न या खुश |
| खुल्दे बड़ी | श्रेष्ठ जन्नत |
| दरख़्त | पेड़ |
| मुद्दत | लंबा समय |
इस नात का सार यह है कि मदीना हर आशिक-ए-रसूल के दिल का सुकून है, जहाँ हर पल जन्नत जैसा नज़ारा और रहमत की बारिश होती है। शायर नबी ﷺ के मोजिज़ों (चमत्कारों) और अहले-बैत की कुर्बानियों का ज़िक्र करते हुए गर्व से कहता है कि तैबा ही हमारा असली ठिकाना और सहारा है।
नात के आखिर में हज़रत अली (हैदर) का ज़िक्र करते हुए उनके और नबी ﷺ के किन मोअजीज़ात (miracles) का ज़िक्र किया गया है, और उन्हें किसका "दुलारा" कहा गया है?