मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) नज़्म के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : सईद अक़ील
नातख्वान/कलाकार: लाइबा फातिमा
जोड़ा गया : 03 Feb, 2026 09:09 AM IST
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मौला मौला! मेरे मौला मौला!
मेरे मौला मौला! मेरे मौला!
बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया!
बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया!
मेरे मौला! मेरे मौला!
मेरे मौला! मेरे मौला!
तेरे दर पर ये तेरा बंदा चला आया,
मैं आसी हूँ, मैं मुजरिम हूँ, तू है रहमान मौला!
मेरी एक-एक धड़कन का तू है निगरान मौला!
अगर चाहे तू, मौला! फिर सभी आसानियाँ हैं,
वर्ना रायगाँ मेरी सभी क़ुर्बानियाँ हैं,
तू मेरे हाल पर अपने करम का कर दे साया
बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया!
बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया!
मेरे मौला! मेरे मौला!
मेरे मौला! मेरे मौला!
तेरे दरबार में दिल से मैं तौबा कर रहा हूँ,
तू क़ादिर है, मैं तेरे इस ग़ज़ब से डर रहा हूँ,
भटक चुका था आखिर पर, ख़ुदा! अब लौट आया हूँ,
कि अपनी आँख में अश्क़-ए-नदामत भर के लाया हूँ,
कि तेरी बारगाह में हाल-ए-दिल मैंने सुनाया
बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया!
बख़्श दे मुझ को ख़ुदाया!
मेरे मौला! मेरे मौला!
मेरे मौला! मेरे मौला!
मौला मौला! मेरे मौला मौला!
मेरे मौला मौला! मेरे मौला!
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यह कलाम एक गुनहगार बंदे की अपने ईश्वर (अल्लाह) से की गई सच्ची क्षमा-याचना और विनती है। इसमें एक मनुष्य अपनी गलतियों को स्वीकार करते हुए खुदा की असीमित दया और करुणा की भीख माँग रहा है।
इन पंक्तियों में भक्त कहता है कि वह अपने पापों पर शर्मिंदा होकर ईश्वर के द्वार पर लौट आया है। वह ईश्वर को अपनी धड़कनों का रखवाला और परम दयालु मानते हुए प्रार्थना करता है कि यदि उसका करम न हुआ, तो जीवन की सारी मेहनत व्यर्थ (रायगाँ) हो जाएगी।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बख़्श दे | क्षमा कर दे / माफ कर दे |
| आसी / मुजरिम | पापी या अपराधी |
| निगरान | देखरेख करने वाला / संरक्षक |
| रायगाँ | व्यर्थ या बेकार (Wasted) |
| क़ादिर | सर्वशक्तिमान |
| ग़ज़ब | क्रोध या कोप |
| अश्क़-ए-नदामत | पछतावे के आँसू |
इस प्रार्थना का सारांश यह है कि इंसान चाहे कितना भी भटक जाए, अंत में उसे सुकून और माफ़ी ईश्वर की चौखट पर ही मिलती है। कवि अपनी 'तौबा' (प्रायश्चित) और आँखों में शर्मिंदगी के आँसू लेकर आया है, इस उम्मीद के साथ कि उसका 'रहमान' मौला उसे अपने क्रोध से बचाकर अपनी शरण में ले लेगा।
नात के आखिर में शायर ने अल्लाह की बारगाह (दरबार) में लौटने की निशानी क्या बताई है, और वो अपने साथ क्या लेकर आया है?