मतलबी ये दुनिया है मतलबी ज़माना है
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टाइटल : ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 01 Nov, 2026 04:35 PM IST
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ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को,
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को,
कर देंगे तड़ीपार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
तुम लोग यज़ीदी हो, बताते हो हुसैनी,
चल जाएगी तलवार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
ऐसे नहीं जाएगा तू बस्ती से हमारी,
पड़ जाएँगी दो-चार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
तू अपने अकीदे को बताता है ख़ज़ाना,
हो जाएगा भंगार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को,
ऐ दीन के गद्दार बुलाऊँ क्या रज़ा को।
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यह कलाम (मुनाज़रात या अंदाज़-ए-डिफा में कही गई शायरी) मुखालिफ़ीन के जवाब में और अपने अक़ीदे व बुज़ुर्गों की शान में कही गई है, जिसमें विरोधी नज़रिए पर तीखा तंज कसते हुए चुनौती दी गई है।
इन पंक्तियों में शायर विरोधियों से मुखातिब होकर उनके दावों और अक़ीदों पर सवाल उठा रहा है और उन्हें उनके रवैये पर कड़ा जवाब देते हुए चुनौती दे रहा है।
शब्द | अर्थ (हिंदी / English) |
|---|---|
दीन के गद्दार | धर्म के खिलाफ चलने वाले / Traitors of religion |
तड़ीपार | शहर या इलाके से निकाला जाना / Banished or exiled |
यज़ीदी | यज़ीद के रास्ते पर चलने वाले (अन्याय या असत्य का प्रतीक) / Follower of Yazid |
अक़ीदा | विश्वास या मज़हबी नज़रिया / Belief or faith |
भंगार | कबाड़ या बेकार चीज़ / Scrap or worthless |
यह कलाम मुनाज़रे (बहस) और विरोध के अंदाज़ में है, जिसमें शायर ने मुखालिफ़िन की नीयत और उनके दावों की हकीकत पर सवाल उठाए हैं। इसमें अपने अक़ीदों की हिफ़ाज़त और मुखालिफ़िन को उनके गलत नजरिए पर कड़ा संदेश देने का ज़िक्र किया गया है।
इस कलाम में शायर ने मुखालिफिन को क्या कहकर पुकारा है और उनके किस दावे पर सवाल उठाया है؟