मतलबी ये दुनिया है मतलबी ज़माना है
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टाइटल : ये न पूछो किधर जा रहा हूँ
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नज़्म के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अज़मत रज़ा भागलपुरी
नातख्वान/कलाकार: अज़मत रज़ा भागलपुरी
जोड़ा गया : 24 Aug, 2026 08:57 AM IST
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ये न पूछो किधर जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
दोस्तों! न आँसू बहाना,
क़ब्र ही तो है असली ठिकाना।
ये न समझो कि मर जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
पास मेरे नहीं सोने-चाँदी,
हाथ मेरे हैं दोनों ही ख़ाली,
छोड़कर माल-ओ-ज़र जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
सामने रू-ए-सरकार होगा,
क़ब्र में उनका दीदार होगा,
बस यही सोचकर जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
सिर्फ़ दो गज़ का जोड़ा पहनकर,
शान से चार कंधों के ऊपर,
देखो करके सफ़र जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
दफ़्न करके मुझे मत भुलाना,
क़ब्र पर तुम मेरी आना-जाना,
सुन लो लख़्त-ए-जिगर जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
ये न पूछो किधर जा रहा हूँ,
आज मैं अपने घर जा रहा हूँ।
महिला संस्करण:
ये न पूछो किधर जा रही हूँ,
आज मैं अपने घर जा रही हूँ।
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यह कलाम मौत की अटल सच्चाई, दुनिया की बे-सुबूती और एक मोमिन की रूहानी उम्मीदों को बयां करता है, जहाँ दुनिया छोड़ने को डरावनी मौत नहीं बल्कि अपने असली घर यानी आख़िरत की तरफ वापसी कहा गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मौत से घबराने या रोने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि यह दुनियावी सफर खत्म करके अपने असल घर (क़ब्र और आख़िरत) की तरफ जाने का नाम है, जहाँ खाली हाथ जाने पर भी हुज़ूर ﷺ के दीदार की उम्मीद सबसे बड़ा सुकून होती है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| ठिकाना | निवास स्थान, असली घर (यहाँ क़ब्र और आख़िरत) |
| माल-ओ-ज़र | धन-दौलत, सोना-चाँदी और दुनियावी संपत्ति |
| रू-ए-सरकार | पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ का मुबारक चेहरा |
| दीदार | दर्शन या मुलाकात |
| दो गज़ का जोड़ा | कफ़न का कपड़ा |
| लख़्त-ए-जिगर | जिगर का टुकड़ा (अपनों या प्रियजनों के लिए संबोधन) |
इस कलाम में मौत के खौफ को एक पुर-सुकून और ईमान-अफरोज़ अंदाज़ में बदला गया है। शायर समझाता है कि इंसान दुनिया से खाली हाथ सिर्फ कफ़न पहनकर कंधों पर सवार होकर जाता है, लेकिन उसके दिल में इस बात की खुशी और तसल्ली होती है कि उसे क़ब्र में सरकार-ए-दो आलम ﷺ का दीदार नसीब होगा।
कलाम में शायर ने मौत और क़ब्र के सफ़र को 'अपने घर जाने' जैसा क्यों कहा है, और क़ब्र में उसे सबसे बड़ा सहारा किस चीज़ का होगा?