मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : या नबी सलाम अलेका
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) सलात ओ सलाम के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 08 Apr, 2023 08:39 AM IST
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या नबी सलाम अलेका
या रसूल सलाम अलेका
या हबीब सलाम अलेका
सलावातुल्लाह अलेका
जश्न-ए-मिलाद उन-नबी है
नूर की चादर तनी है
रौशनी ही रौशनी है
हर तरफ ये धूम मची है
या नबी सलाम अलेका...
हो मुबारक अहले ईमान
हो गई सुबह-ए-बहारां
हो गया हर घर चराग़ां
सलावातुल्लाह अलेका
या नबी सलाम अलेका...
आमिना बीबी का जाया
बारहवीं तारीख़ आया
सुबह सादिक ने सुनाया
सलावातुल्लाह अलेका
या नबी सलाम अलेका...
रहमतों के ताज वाले
दो जहां के राज वाले
अर्श की मेराज वाले
आसियों की लाज वाले
या नबी सलाम अलेका...
मुस्तफा ख़ैरुल वरा हो
सरवरे हर दो सरा हो
अपने अच्छों का तसद्दुक
हम बड़ों को भी निबाहो
या नबी सलाम अलेका...
या हबीब-ए-रब-ए-दावर
अज़पा-ए-सिद्दीक-ए-अकबर
और उमर, उस्मान ओ हैदर
चश्म-ए-बैतर दो क़ल्ब-ए-अज़ पर
या नबी सलाम अलेका...
रहमतलिल-आलमीनां
हो अता ऐसा करीना
देख कर मीठा मदीना
इश्क़ में पिघल जाए सीना
या नबी सलाम अलेका...
आख़री लम्हे जब आ आएं
काश वो तशरीफ़ ला आएं
अपने जलवों में गुमाएं
झूम कर हम गुनगुनाएं
या नबी सलाम अलेका...
रूह जब तन से जुदा हो
माह-ए-रमज़ान, दिन जुमा हो
दोपहर से दिन ढला हो
लब पे जारी ये सदा हो
या नबी सलाम अलेका...
जानकनी के वक़्त आना
कलिमा-ए-तैयब पढ़ाना
मक्र-ए-शैतां से बचाना
अपने दामन में छुपाना
या नबी सलाम अलेका...
इतना करम शाह-ए-ज़मां हो
ख़ाली रूह से बदन हो
आप के शहर का कफ़न हो
और मदीने में दफ़न हो
या नबी सलाम अलेका...
हश्र में सरकार आना
मेरे ऐब को छुपाना
अपने रब से बख़्श दिलाना
साथे-जन्नत में बसाना
या नबी सलाम अलेका...
हो न तन्हा रोज़-ए-महशर
साथ हों शब्बीर ओ शब्बर
हाथ में दामन अली का
सर पे हो ज़हरा की चादर
या नबी सलाम अलेका...
जान कर काफ़ी सहारा
ले लिया है दर तुम्हारा
ख़ल्क़ के वारिस ख़ुदारा
लो सलाम अब तो हमारा
या नबी सलाम अलेका...
ऐ शहंशाह-ए-ज़माना
आपका ये आस्ताना
रहमतों का है ख़ज़ाना
हो निगाह-ए-मेहरबाना
या नबी सलाम अलेका...
ऐ शहंशाह-ए-मदीना
नूर से मामूर सीना
मश्क़ से बेहतर पसीना
देख लें हम सब मदीना
या नबी सलाम अलेका...
या शफ़ीउल-मुज़्नबीना
मोहब्बत-ए-वैयुस शकीना
नूर से मामूर सीना
मश्क़ से बेहतर पसीना
या नबी सलाम अलेका...
ऐ मेरे मौला के प्यारे
नूर की आँखों के तारे
अब किसे सय्यद पुकारे
हम तुम्हारे, तुम हमारे
या नबी सलाम अलेका...
बख़्श दो जो चीज़ चाहो
क्यूंकि महबूब-ए-ख़ुदा हो
मुस्तफा हो, मुझ्तबा हो
जो कहूं, उससे सिवा हो
या नबी सलाम अलेका...
वास्ता एहले अ़बा का
सदक़ा हज़रत फ़ातिमा का
और शहीद-ए-कर्बला का
ग़म न हो रोज़-ए-जज़ा का
या नबी सलाम अलेका...
अस्त-तुफ़ैल-ए-गौस-ए-आज़म
गंज-बख़्श-ए-फ़ैज़-ए-आज़म
सदक़ा-ए-इमाम-ए-आज़म
दूर हों सब ही के रंज ओ ग़म
या नबी सलाम अलेका...
अशरफ़ी सहरा तुम्हारा
अशरफ़ी आका हमारा
करके दुनिया से किनारा
रखता है तुमसे सहारा
लो ख़बर जल्दी ख़ुदारा
या नबी सलाम अलेका...
(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
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यह विश्वप्रसिद्ध और शाश्वत 'सलाम' है, जिसे आमतौर पर मिलाद और धार्मिक सभाओं के अंत में पूरी श्रद्धा के साथ खड़े होकर हुज़ूर ﷺ की बारगाह में नज़राना-ए-अक़ीदत पेश करने के लिए पढ़ा जाता है। इसमें नबी ﷺ के आगमन की खुशियों के साथ-साथ जीवन के अंतिम क्षणों और परलोक में उनकी सहायता की भावपूर्ण गुहार लगाई गई है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हे नबी, हे अल्लाह के रसूल, हे ईश्वर के प्रिय (हुज़ूर ﷺ), आप पर ईश्वर की अनंत कृपा और शांति हो। शायर कहता है कि आपके आगमन से पूरे संसार में अध्यात्म और नूर की चादर तन गई है, इसलिए जीवन के अंतिम समय (मृत्यु) और कयामत के कठिन पड़ाव पर आप ही हमारे एकमात्र रक्षक हैं, जो हमें अपनी छत्रछाया में लेकर ईश्वर से हमारी मग़फ़िरत (क्षमा) करवाएँगे।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सलावातुल्लाह | अल्लाह की ओर से रहमत और कृपा |
| आसियों / बड़ों | पापियों / गुनहगारों या बुरे लोगों |
| ख़ैरुल वरा | समस्त सृष्टि में सबसे उत्तम (हुज़ूर ﷺ) |
| जानकनी | मृत्यु की पीड़ा / शरीर से प्राण निकलने का समय |
| रोज़-ए-महशर / जज़ा | कयामत का दिन / न्याय का दिन |
| अहले अ़बा (आले अबा) | पवित्र पंजतन पाक (हज़रत अली, फ़ातिमा, हसन और हुसैन) |
| शब्बीर ओ शब्बर | इमाम हुसैन और इमाम हसन के पवित्र नाम |
| मामूर | पूरी तरह से भरा हुआ / परिपूर्ण |
इस मुक़द्दस सलाम का मूल सार यह है कि हुज़ूर ﷺ दोनों जहान के स्वामी और लाचारों का मान रखने वाले हैं। शायर अपने जीवन की सबसे बड़ी अभिलाषा व्यक्त करते हुए प्रार्थना करता है कि उसकी मृत्यु पवित्र रमज़ान महीने के जुमे के दिन दोपहर के समय हो, होठों पर यही सलाम जारी हो, स्वयं आक़ा ﷺ उसे कलमा पढ़ाने तशरीफ़ लाएँ, मदीने की धरती का कफ़न हो और वहीं दफ़्न होने का सौभाग्य मिले ताकि परलोक के सफर में पंजतन पाक और गौस-ए-आज़म के सदक़े हर ग़म और डर दूर हो जाए।
शायर ने अपनी मौत (जानकनी) और दफ़्न होने के वक़्त के लिए क्या-क्या ख़्वाहिशें बयान की हैं, और उन्होंने किस दिन और महीने में रूह क़ब्ज़ होने की दुआ की है?