मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
- 1 दिन पहले fiber_manual_record 52 बार देखा गया
टाइटल : दो आलम के आका सलाम अलैकुम
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) सलात ओ सलाम के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : खालिद महमूद खालिद
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 03 Feb, 2026 09:48 AM IST
बार देखा गया : 389
Time to read: 1 min read
दो आलम के आका सलाम अलैकुम,
नवीद-ए-मसीहा सलाम अलैकुम
तेरे नूर से है हर इक हुस्न पैदा,
तेरे हुस्न पर है ख़ुदा ख़ुद भी शैदा
तेरी ज़ात-ए-अक़दस में कौनैन हैं गुम,
दो आलम के आका सलाम अलैकुम
नवीद-ए-मसीहा सलाम अलैकुम,
तेरी निकहत-ए-ज़ुल्फ़ का नाम जन्नत
निगाह-ए-करम हैं अदाएँ सख़ावत,
सिखाया है तूने गुलों को तबस्सुम
दो आलम के आका सलाम अलैकुम,
नवीद-ए-मसीहा सलाम अलैकुम
गिरे तो तुम्हारे करम ने संभाला,
तुम्हारी अता ने दो आलम को पाला
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह कलाम हुज़ूर ﷺ की शान में एक बेहद खूबसूरत और रूहानी सलाम है। इसमें नबी ﷺ की नूरानी शख्सियत और पूरी कायनात पर उनके परोपकार का गुणगान किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि दोनों जहानों के मालिक और ﷺ पर सलाम हो, जिनके नूर से ही संसार की समस्त सुंदरता उत्पन्न हुई है। कवि कहता है कि आप ﷺ का व्यक्तित्व इतना महान है कि दोनों जहान आप ही में समाहित हैं और कलियों ने मुस्कुराना भी आपकी मुस्कुराहट से सीखा है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दो आलम | दोनों जहान (लोक और परलोक) |
| नवीद-ए-मसीहा | मुक्तिदाता या मसीहा की सुखद सूचना |
| शैदा | मोहित या फिदा होना |
| ज़ात-ए-अक़दस | अत्यंत पवित्र अस्तित्व (व्यक्तित्व) |
| कौनैन | ब्रह्मांड / दोनों संसार |
| निकहत-ए-ज़ुल्फ़ | बालों (ज़ुल्फ़ों) की सुगंध |
| तबस्सुम | मुस्कुराहट (Smile) |
इस कलाम का सारांश यह है कि हज़रत मुहम्मद (S.A.W) की जात वह स्रोत है जहाँ से ईश्वर का नूर और कृपा पूरी दुनिया में फैलती है। जब भी कोई बेसहारा व्यक्ति मुसीबत में गिरता है, तो उनका करम ही उसे संभालता है, क्योंकि सारा संसार उन्हीं के द्वारा दी गई नेमतों पर पल रहा है।
इन बोलों के अनुसार, "गुलों" (फूलों) को मुस्कुराना किसने सिखाया है और इंसान के गिरने पर किसने सहारा दिया?