मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : बस रहा है नज़र में मदीना
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) सलात ओ सलाम के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अब्दुल सत्तार नियाज़ी
नातख्वान/कलाकार: फुरकान कादरी
जोड़ा गया : 01 Feb, 2026 06:43 PM IST
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क़ाफ़िले सू-ए-तैबा चले हैं,
आज फिर से मैं तन्हा खड़ा हूँ
जा सका न मैं अब के भी, मौला!
बस यही सोच कर रो रहा हूँ
बस रहा है नज़र में मदीना,
दिल में अरमान है हाज़िरी के,
रोते-रोते, मदीने के वाली!
बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के
मेरा जीना भी है कोई जीना,
दूर है मुझ से तेरा मदीना,
जीते-जी वो घड़ी भी तो आए,
देख लूँ जलवे तेरी गली के
बस रहा है नज़र में मदीना,
दिल में अरमान है हाज़िरी के,
रोते-रोते, मदीने के वाली!
बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के
मेरी उम्मत पे कर दे अताएँ,
बख़्श दे इन की सारी ख़ताएँ,
मुस्तफ़ा कर रहे हैं दुआएँ,
बख़्त देखो ज़रा उम्मती के
हुज़ूर! ऐसा कोई इंतज़ाम हो जाए,
सलाम के लिए हाज़िर गुलाम हो जाए
हुज़ूर आप जो चाहें तो कुछ नहीं मुश्किल,
सिमट के फ़ासिला ये चंद-गाम हो जाए
मदीने जाऊँ, फिर आऊँ, दुबारा फिर जाऊँ,
ये ज़िंदगी मेरी यूँ ही तमाम हो जाए
बस रहा है नज़र में मदीना,
दिल में अरमान है हाज़िरी के,
रोते-रोते, मदीने के वाली!
बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के
ग़म के मारों का तू आसरा है,
तू नियाज़ी का मुश्किल-कुशा है,
मेरे मौला! मुझे इतना दे दे,
हर बरस लूँ मज़े हाज़िरी के
बस रहा है नज़र में मदीना,
दिल में अरमान है हाज़िरी के,
रोते-रोते, मदीने के वाली!
बीत जाएँ न दिन ज़िंदगी के
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यह कलाम मदीना जाने की तड़प और वहाँ से दूर रहने के ग़म का एक भावुक चित्रण है। इसमें एक आशिक़-ए-रसूल अपनी बेबसी और हाज़िरी की तीव्र इच्छा को शब्दों में पिरो रहा है।
इन पंक्तियों में कवि कहता है कि लोगों के काफ़िले मदीने की ओर जा रहे हैं और मैं फिर अकेला रह गया हूँ। वह दुआ करता है कि हुज़ूर ﷺ ऐसा इंतज़ाम कर दें कि मीलों की दूरियाँ चंद कदमों में सिमट जाएँ और मेरी पूरी ज़िंदगी मदीने के चक्कर लगाने में ही गुज़र जाए।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सू-ए-तैबा | मदीना की दिशा में |
| काफ़िले | यात्रियों का समूह |
| मदीने के वाली | मदीना के स्वामी (नबी ﷺ) |
| बख़्त | भाग्य या किस्मत |
| इंतज़ाम | व्यवस्था (Arrangement) |
| चंद-गाम | कुछ कदम की दूरी |
| मुश्किल-कुशा | कठिनाइयों को दूर करने वाला |
इस नात का सारांश यह है कि मदीने से दूरी एक प्रेमी के लिए असहनीय है। वह हुज़ूर ﷺ से इल्तेज़ा करता है कि उसे हर साल हाज़िरी का मौक़ा मिले। वह अपनी उम्मत के लिए नबी ﷺ की दुआओं का ज़िक्र करते हुए अपनी ज़िंदगी की अंतिम साँसें भी मदीने की गलियों की याद में गुज़ारना चाहता है।
क्या काफ़िलों को जाते देख ऐसी तड़प आपके दिल में भी कभी जागी है?