मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) नज़्म के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : दिलकश रांचवी
नातख्वान/कलाकार: फहीम रज़ा हबीबी
जोड़ा गया : 26 Oct, 2022 12:15 PM IST
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किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
रहमत खुदा-ऐ-पाक की लाती हैं बेटियाँ
माँ बाप की सदाओं पे लब्बेक बोल कर
बेटों से पहले दौड़ के आती हैं बेटियाँ
किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
बेटों से कम न समझो इन्हे दोस्तों कभी
सोऐ हुए नसीब जगाती हैं बेटियाँ
किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
एक अजनबी के घर को बसाने के वास्ते
बाबुल के घर को छोड़ के जाती हैं बेटियाँ
किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
आए लोग अब तो छोड़ दो तुम मांगना जहेज़ (दहेज)
फांसी गले में अपने लगाती हैं बेटियाँ
किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
अब इससे बढ़ के कौनसी दौलत की तलब है
जन्नत तुमहरे घर को बनाती हैं बेटियाँ
किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
बेटे हजारों ज़ुल्मों सितम करते हैं मगर
माँ बाप को कभी न सताती हैं बेटियाँ
किस्मत से जिसके घर में भी आती हैं बेटियाँ
रहमत खुदा-ऐ-पाक की लाती हैं बेटियाँ
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यह बेटियों की गरिमा, उनके त्याग और समाज में उनकी अहमियत का सुंदर वर्णन है, जिसमें बताया गया है कि बेटियां ईश्वर का अनुपम उपहार हैं और उनका जन्म परिवार के सौभाग्य का प्रतीक है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि बेटियां माता-पिता की एक पुकार पर अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहती हैं और बेटों से भी पहले सेवा के लिए आगे आती हैं। कवि समाज को सचेत करते हैं कि दहेज जैसी कुप्रथा के कारण हमें इन मासूमों को दांव पर नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि जो बेटियां माता-पिता को कभी दुख नहीं देतीं, वे ही घर को स्वर्ग बनाती हैं।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| रहमत | ईश्वर की कृपा / आशीर्वाद |
| खुदा-ऐ-पाक | पवित्र ईश्वर / परमेश्वर |
| सदाओं | पुकार / आवाजें |
| लब्बेक | मैं हाजिर हूँ / आज्ञा का पालन करना |
| नसीब | भाग्य / किस्मत |
| बाबुल | पिता का घर |
| जहेज़ | दहेज |
| तलब | चाह / इच्छा / कामना |
| ज़ुल्म-ओ-सितम | अत्याचार / अन्याय |
बेटियां किस्मत वालों के घर जन्म लेती हैं और सोए हुए भाग्य को जगाती हैं। वे दूसरों का घर बसाने के लिए अपना मायका छोड़ देती हैं, इसलिए उन्हें कभी बेटों से कम नहीं आंकना चाहिए। समाज को दहेज मांगना बंद करना चाहिए ताकि किसी बेटी को फांसी न लगानी पड़े, क्योंकि बेटियां ही घर को जन्नत का रूप देती हैं।
शायर के मुताबिक, बेटियाँ अपने माता-पिता की 'सदाओं' (पुकार) पर क्या बोलकर दौड़ के आती हैं, और जहेज (दहेज) माँगने पर उनका क्या हाल होता है?