मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : काबे के बद्रुदुजा तुमपे करोड़ों दुरूद
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) सलात ओ सलाम के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 08 Apr, 2023 09:10 AM IST
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काबे के बद्रुदुजा तुमपे करोड़ों दुरूद
तैबा के शमसूद दुहा तुमपे करोड़ों दुरूद
शाफ’इ रोज़े जज़ा तुमपे करोड़ों दुरूद
दाफा’इ जुमला बला तुमपे करोड़ों दुरूद
दिल करो ठंडा मेरा वह कफे पा चाँद सा
सीने पे रखदो ज़रा तुमपे करोड़ों दुरूद
और कोई रौब क्या तुम से निहा भला
जब न खुदा ही छुपा तुमपे करोड़ों दुरूद
वो शबे मेअराज राज वो शफे महशर का ताज
कोई भी ऐसा हुवा तुमपे करोड़ों दुरूद
कर के तुम्हारे गुनाह मांगे तुम्हारी पनाह
तुम कहो दामन में आ तुमपे करोड़ों दुरूद
तुम हो हफ़िज़ो मुगीस क्या हुवा दुश्मन खबीस
तुम हो तो फिर खौफ क्या तुमपे करोड़ों दुरूद
एक तरफ आदा ए दीं एक तरफ हासिदीन बंदा है
तनहा शहा तुमपे करोड़ों दुरूद
हम ने खता में न की तुम ने अत में की
कोई कमी सरवारा तुमपे करोड़ों दुरूद
काम वो ले लिजीए तूमको जो राज़ी करे
ठिक हो नामे रज़ा तुमपे करोड़ों दुरूद
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यह विश्वप्रसिद्ध कलाम इमाम-ए-अहले-सुन्नत आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी द्वारा रचित 'मुस्तफ़ा जाने रहमत पे लाखों सलाम' की तरह ही एक बेहद मक़बूल 'सलाम' है। इसमें हुज़ूर ﷺ की बेमिसाल अज़मत, उनके अद्वितीय ज्ञान और कयामत के दिन उनकी शफ़ाअत (सिफ़ारिश) को दर्शाया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि काबे के पूर्ण चंद्रमा (बद्रुद्दुजा) और मदीने के चमकते सूर्य (शम्सुद्दुहा) अर्थात् हुज़ूर ﷺ पर करोड़ों दुरूद-ओ-सलाम हों। शायर कहता है कि कयामत के दिन (रोज़-ए-जज़ा) जब कोई किसी का मददगार नहीं होगा, तब आप ही हमारी मग़फ़िरत (क्षमा) का ज़रिया होंगे और आपकी ही दया से दुनिया और आख़िरत की तमाम बलाएँ और मुसीबतें टल जाती हैं।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| बद्रुद्दुजा | अंधेरे को दूर करने वाला पूर्ण चंद्रमा |
| शम्सुद्दुहा | सुबह का चमकता हुआ साक्षात् सूर्य |
| रोज़-ए-जज़ा | न्याय का दिन / कयामत का दिन |
| शाफ़'इ | पापों की क्षमा के लिए सिफ़ारिश करने वाले |
| दाफ़'इ | बलाओं और मुसीबतों को टालने/दूर करने वाले |
| जुमला | संपूर्ण / तमाम या सब |
| कफ़-ए-पा | पवित्र तलवा / पैर का निचला हिस्सा |
| निहा (निहाँ) | छुपा हुआ / अदृश्य |
| आदा-ए-दीं | धर्म के दुश्मन |
| हासिदीन | ईर्ष्या करने वाले / जलने वाले लोग |
इस मुक़द्दस कलाम का सार यह है कि आक़ा ﷺ की दया और उदारता असीमित है; वे अपने पापी उम्मतियों को दुत्कारते नहीं बल्कि अपने दामन में पनाह देते हैं। शायर कहता है कि भले ही एक तरफ़ दीन के दुश्मन हों और दूसरी तरफ़ जलने वाले लोग हों, जब सिर पर नबी ﷺ का साया और सहारा है तो किसी बात का कोई डर (ख़ौफ़) नहीं है। अंत में आला हज़रत दुआ करते हैं कि आक़ा ﷺ उनसे ऐसा काम ले लें जिससे वे राज़ी हो जाएँ और उनके इस 'रज़ा' (शायर का नाम और रज़ा का अर्थ 'प्रसन्नता') नाम की लाज रह जाए।
शायर के मुताबिक कयामत के दिन (रोज़-ए-जज़ा) गुनाहगारों का असली सहारा कौन होगा, और जन्नत में दाखिले के हवाले से उन्होंने क्या शर्त बयान की है?