मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : झूला झुलाऊँ मैं तुझे झूला झुलाऊँ
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स) कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 19 Feb, 2023 12:14 PM IST
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झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
मैं ख्वाब में असगर तुझे लोरी दे सुलाऊँ,
मैं ख्वाब में असगर तुझे लोरी दे सुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
लौट आओ सफर से के बड़ी देर हुई है,
बेताब हु कबसे तुझे सीने से लगाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
कोई मुझे बतलाता नहीं तेरी निशानी,
बरसात में तीरों के कहाँ धूनड़ने जाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
सोचा था तेरी सालगिरा घर पे करूंगी,
तकदीर यह कहती है तेरा सोग मनाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
बाबा से तेरे तेरा जनाज़ा न उठेगा,
रुक जा ज़रा अब्बास को दरिया से बुलाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
यह खून से भरा कुरता यह मट्टी में भरे बाल,
सीने में छुपाऊँ के मैं आँखों से लगाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
इस तरह कोई रूठ के माँ से नहीं जाता,
तू खुद ही बता दे मैं तुझे कैसे मनाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
रेहान के नोहे पे सदा बानो की आई,
मैं आँख पे अशकों के समंदर को बहाऊँ
मैं झूला झुलाऊँ, तुझे मैं झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँघर का झूला
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
मैं ख्वाब में असगर तुझे लोरी दे सुलाऊँ,
मैं ख्वाब में असगर तुझे लोरी दे सुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ,
झूला झुलाऊँ, मैं तुझे झूला झुलाऊँ
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यह कर्बला के दर्दनाक वाक़िए पर आधारित एक बेहद ग़मगीन और दिल को झकझोर देने वाला मर्सिया (नोहा) है। इसमें हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के ६ महीने के मासूम बेटे हज़रत अली असग़र की शहादत के बाद, उनकी माता (जनाब-ए-बानो) के विलाप और उनके ख़ाली झूले को देखकर उठने वाले दर्द को बयां किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि एक बेबस माँ कर्बला के तपते मैदान में अपने प्यासे और शहीद बच्चे अली असग़र के ख़ाली झूले को देखकर रो रही है और ख़्वाब में उसे लोरी देकर सुलाने की कोशिश कर रही है। माँ तड़पकर कहती है कि "हे मेरे लाल! इस आख़िरी सफ़र से लौट आओ, मैं कबसे तुम्हें सीने से लगाने के लिए बेताब हूँ; जहाँ मुझे घर पर तुम्हारा जन्मदिन मनाना था, वहाँ अब तक़दीर मुझे तुम्हारा मातम मनाने पर मजबूर कर रही है।"
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| असग़र | हज़रत अली असग़र (इमाम हुसैन के ६ महीने के मासूम सुपुत्र) |
| सालगिरा | जन्मदिन (Birthday) |
| सोग | शोक या मातम मनाना / गहरा दुःख |
| जनाज़ा | शव-यात्रा / अर्थी |
| अब्बास / दरिया | हज़रत अब्बास (इमाम हुसैन के भाई और कर्बला के अलमदार) / फ़ुरात नदी |
| बानो | जनाब-ए-रबाब (हज़रत अली असग़र की माता का उपनाम) |
| नोहा / सदा | शोकगीत या विलाप काव्य / आवाज़ या पुकार |
इस नोहे का मूल सार पुत्र-वियोग में तड़पती एक माँ का वो असीम दुःख है, जिसका मासूम बच्चा तीरों की बरसात में शहीद कर दिया गया। माँ अपने बच्चे के ख़ून से सने कुर्ते और मिट्टी से सने बालों को देखकर बिलखती है और कहती है कि "इतने छोटे बच्चे का जनाज़ा तुम्हारे अकेले बाबा (इमाम हुसैन) से नहीं उठेगा, रुक जाओ मैं दरिया (फ़ुरात) के किनारे से तुम्हारे वीर चचा अब्बास को मदद के लिए बुलाती हूँ।" वह रूठे हुए बच्चे से कहती है कि कोई इस तरह माँ से रूठकर नहीं जाता, और अंत में शायर 'रेहान' के इस नोहे पर बानो की रोने की आवाज़ आती है जो आँखों से आँसुओं का समंदर बहा रही हैं।
लिरिक्स के मुताबिक, माँ बानो ने बच्चे की सालगिरह (जन्मदिन) के बारे में क्या सोचा था और अब तक़दीर उन्हें क्या करने पर मजबूर कर रही है?