मेरे सरकार आए
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टाइटल : नबी नबी या नबी नबी
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अज़ीज़ मियां
नातख्वान/कलाकार: अज़ीज़ मियां
जोड़ा गया : 04 Sep, 2025 08:17 PM IST
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बी नबी.. या नबी नबी..
या नबी नबी.. या नबी नबी..
दुनिया में हसीं तो लाखों ही हैं,
तनवीर-ए-मुजस्सम कोई नहीं
ए ख़त्म-ए-रिसालत तेरे सिवा,
महबूब-ए-दो आलम कोई नहीं
कोई नहीं.. कोई नहीं..
तेरे सिवा.. कोई नहीं..
मेहमान हुए अल्लाह के तुम,
मेहमान हुए अल्लाह के तुम,
जिब्रील-ए-अमीन मुख पलक़ों से,
मलमल के नबी को जगाते हैं,
जल्दी से चलो ऐ सरवर-ए-दीन,
अल्लाह तुम्हें बुलवाते हैं
फिरदौस का जामा नूरानी,
उस माह को जब पहनाते हैं,
अंदाज़ पे मिट मिट जाते हैं,
और अपनी ज़ुबानी पर लाते हैं
मेहमान हुए अल्लाह के तुम,
ये जिन-ओ-मलक सब जानते हैं,
ख़िलवत में क्या बातें हुईं,
इस राज़ का महरम कोई नहीं
तेरे सिवा या मुहम्मद ﷺ
तेरे सिवा या मुहम्मद ﷺ
गुनहगारों का हामी बरोज़-ए-महशर,
तेरे सिवा कोई नहीं..
तेरे सिवा या मुहम्मद ﷺ
दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा,
मैं, दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा,
दर-ए-नबी फिर.. दर-ए-नबी है,
दर-ए-नबी है.. दर-ए-नबी है,
वो, दर-ए-नबी है.. दर-ए-नबी है
ख़बरदार ऐ दिल, मुक़ाम-ए-अदब है,
क्यूँ? वो दर-ए-नबी है.. दर-ए-नबी है
दर-ए-नबी पर पड़ा रहूँगा,
पड़े ही रहने से काम होगा,
कभी तो क़िस्मत खुलेगी मेरी,
कभी तो मेरा सलाम होगा
बी नबी.. या नबी नबी..
या नबी नबी.. या नबी नबी..
मैं तो ढूँढत ढूँढत हार गई,
मुझे पिया के नगर का डगर न मिला,
तन टूट गया, मन छूट गया,
मुझे हाय! वो श्याम सुंदर न मिला
मैं तो बैठी थी मन में ये आस धरे,
के वो आका पिया मुझे याद करे,
वा के चरणों में, जाकर मैं शीश धरूँ,
कोई मेरी ख़ता को वो माफ़ करे
ना बानी में, ना बाग़ में खाया मुझे,
ना पहाड़ों पे नागिन हाय डसो,
मेरे भाग्य से ताल भी छूट गया,
कहीं प्रीतम प्यारे का घर न मिला
अज़ीज़ मीम के परदे को जब उठता देखा,
तन-ए-रसूल में मौला छुपा हुआ देखा
नबी नबी.. या नबी नबी..
या नबी नबी.. या नबी नबी..
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यह कलाम नबी-ए-करीम ﷺ की अद्वितीय सुंदरता, उनके सफ़र-ए-मेराज (ईश्वर से मिलन) और उनके दर पर एक प्रेमी की अटूट आस्था का वर्णन है। इसमें बताया गया है कि पूरी कायनात में उनके जैसा न कोई हसीन है और न ही ईश्वर का इतना करीबी।
इन पंक्तियों का उद्देश्य मेराज की उस महान रात का चित्रण करना है जब जिब्रील (अ.) ने अदब के साथ हुज़ूर ﷺ को जगाया और वह अल्लाह के मेहमान बने। साथ ही, यह कलाम एक आशिक़ की उस तड़प को भी दर्शाता है जो दुनिया की तमाम राहों को छोड़ कर केवल नबी के चरणों में शरण लेना चाहता है, क्योंकि वही महशर के दिन गुनाहगारों के एकमात्र मददगार हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तनवीर-ए-मुजस्सम | साक्षात प्रकाश / नूर का शरीर (Personified Light) |
| ख़त्म-ए-रिसालत | अंतिम नबी (Finality of Prophethood) |
| सरवर-ए-दीन | धर्म के नेता / आका (Leader of the Religion) |
| ख़िलवत | एकांत / तन्हाई (Solitude/Privacy) |
| महरम | राज़दार / भेद जानने वाला (One who knows secrets) |
| हामी | रक्षक / हिमायती (Protector/Supporter) |
| बरोज़-ए-महशर | न्याय के दिन (On the Day of Judgment) |
| डगर | रास्ता / मार्ग (Path/Way) |
| शीश धरुं | सिर झुकाना (To bow the head) |
इस कलाम का सार यह है कि हुज़ूर ﷺ वह महान हस्ती हैं जिनके सिवा दोनों जहान में खुदा का कोई और महबूब नहीं है। मेराज की रात खुदा और उनके बीच जो बातें हुईं, वह एक ऐसा राज़ है जिसका महरम उनके सिवा कोई नहीं। अंत में यह संदेश दिया गया है कि मोमिन की निजात केवल नबी के दर पर पड़े रहने में है, जहाँ अदब के साथ इंतज़ार करने से एक न एक दिन किस्मत ज़रूर चमकती है और गुनाहों की माफ़ी मिलती है।
नात के आखिरी मिसरे (पंक्ति) में "अज़ीज़" ने पर्दा उठा कर क्या देखने का दावा किया है, और "तन-ए-रसूल" के बारे में क्या बताया गया है?