मेरे सरकार आए
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टाइटल : ये तो ख़्वाजा का करम है
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : असलम साबरी
नातख्वान/कलाकार: असलम साबरी
जोड़ा गया : 02 Jan, 2024 09:01 AM IST
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ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
लेते ही नाम ख़्वाजा का तूफ़ान हट गया
कश्ती में मेरी आ के समंदर सिमट गया
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
ख़्वाजा के इश्क़ में मुझे बतलाऊँ क्या मिला
मुर्शिद मिले, रसूल मिले और ख़ुदा मिला
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
दामन को मेरे भर दिया ख़ुशियों से ख़्वाजा ने
औक़ात से ज़ियादा नवाज़ा है ख़्वाजा ने
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
जिस वक़्त मैंने, दोस्तो ! ख़्वाजा को पुकारा
फ़ौरन ही मिल गया मुझे मुश्किल में सहारा
जब से मिला है मुझ को उसी दर का उतारा
पहुँचा बुलंदियों पे मुक़द्दर का सितारा
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
मुझ ग़मज़दा को आप ने दर पे बुला लिया
दामन में अपने ख़्वाजा ने मुझ को छुपा लिया
ख़्वाजा पिया का मुझ पे ये एहसान देखिए
मुझ जैसे इक हक़ीर को अपना बना लिया
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
क्या शान-ए-करम, जूद-ओ-सख़ा, बहर-ए-अता है
ख़ुद मँगतों को ख़्वाजा का करम ढूँढ रहा है
जब तक बिका न था तो कोई पूछता न था
तुम ने ख़रीद कर मुझे अनमोल कर दिया
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
निस्बत मिली है जब से मुझे तेरे नाम की
इज़्ज़त जहाँ में होने लगी इस ग़ुलाम की
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
कभी कभी तो कोई नवाज़े
मेरा ख़्वाजा सदा नवाज़े
उसी दर की बदौलत, बा-ख़ुदा, पाई है ये दौलत
लुटाता जाता हूँ जितनी ये उतनी बढ़ती जाती है
ये तो ख़्वाजा का करम है
मेरे ख़्वाजा का करम है
ये तो ख़्वाजा का करम है
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यह सूफ़ियाना कलाम हज़रत ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ (रह.) की असीम कृपा और उनके दर पर मिलने वाली रूहानी दौलत का एक भावपूर्ण शुक्रिया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि ख़्वाजा साहब का नाम लेते ही जीवन के बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं और उनकी कृपा से भक्त को सत्य के मार्ग (मुर्शिद, रसूल और ख़ुदा) की पहचान होती है। शायर कहता है कि वह एक साधारण और 'हक़ीर' व्यक्ति था, लेकिन ख़्वाजा ने उसे अपनी निस्बत (संबंध) देकर दुनिया की नज़रों में अनमोल और प्रतिष्ठित बना दिया है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सिमट गया | इकट्ठा होना या छोटा हो जाना |
| नवाज़ा | कृपा करना या दान देना (Blessed) |
| ग़मज़दा | दुखों का मारा हुआ (Sorrowful) |
| हक़ीर | तुच्छ या बहुत छोटा (Insignificant) |
| जूद-ओ-सख़ा | दानशीलता और उदारता |
| बहर-ए-अता | कृपा का समुद्र |
| निस्बत | संबंध या लगाव (Connection) |
इस कलाम का सार यह है कि ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (रह.) का करम अपने चाहने वालों पर सदा जारी रहता है और वे अपनी सामर्थ्य से कहीं अधिक अपने मँगों को प्रदान करते हैं। शायर अपनी सफलता और सम्मान का पूरा श्रेय ख़्वाजा की गुलामी को देता है, जिसके कारण उसके भाग्य का सितारा बुलंद हुआ है। वह स्पष्ट करता है कि उनके दर से मिली रूहानी दौलत लुटाने (बाँटने) से और अधिक बढ़ती है।
शायर ने ऐसा क्यों कहा कि ख़्वाजा के इश्क़ में उन्हें "मुर्शिद, रसूल और ख़ुदा" सब मिल गए?