मेरे सरकार आए
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टाइटल : माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स) नज़्म के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : ज़हीर आलम
नातख्वान/कलाकार: अब्दुल हबीब अजमेरी
जोड़ा गया : 05 Dec, 2022 12:24 PM IST
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माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा
तू हो नाराज़ तो खुश हमसे ख़ुदा क्या होगा
याद है आज भी ऐ माँ वो ज़माना मेरा,
मुझको स्कूल तलक छोड़ के आना तेरा।
सर्द जाड़ों की ठिठुरती हुई रातों में मुझे,
माँ छुपा लेती थी तू प्यार से बाहों में मुझे।
गर्मियों में मुझे आँचल की हवा देती थी,
फूलने-फलने की तू मुझको दुआ देती थी।
रात भर जाग के सीने पे सुलाया तूने,
ख़ुद रही भूखी मगर मुझको खिलाया तूने।
तेरे जैसा किसी और का दिल क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
तुझको अल्लाह ने क्या ख़ूब शर्फ़ बख़्शा है,
ज़िक्र क़ुरआन के परों में तेरा आया है।
तेरी अजमत को फ़रिश्तों ने सलामी दी है,
यानी वलियों ने, इमामों ने ग़ुलामी की है।
अपने बेटों के सितम हँस के उठा लेती है,
और तू ही है कि उन्हें फिर दुआ देती है।
है तेरी ज़ात पे अल्लाह की क़ुदरत को भी नाज़,
हो इजाज़त तो पढ़ूं तेरे आँचल पे नमाज़।
मर्तबे में कोई माँ तुझसे बड़ा क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
तूने औलाद पे क्या कुछ नहीं क़ुर्बान किया,
अपनी नींदें हमें दीं, अपना वो सुख-चैन दिया।
लोग करते थे अगर तुझसे शिकायत मेरी,
जान पर खेल के करती थी हिफाज़त मेरी।
जब कोई मुझे सताए तो बिगड़ जाती थी,
मेरी ख़ातिर कभी झगड़े पे उतर जाती थी।
मेरी साँसों में तू मौजूद है ख़ुशबू बनकर,
मेरी रातों में चमकती है तू जुगनू बनकर।
तेरा दिल तोड़ के बेटों का भला क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
याद आती है अभी तक मुझे बातें तेरी,
मेरे रोने से छलक जाती थीं आँखें तेरी।
तू मुझे रोता हुआ देख के रो देती थी,
अपना सुख-चैन मेरे वास्ते खो देती थी।
ये दुआएं मुझे दे दे, मैं संवर जाऊँगा,
तू यूँ ही रूठी रहेगी तो मैं मर जाऊँगा।
होगा एहसान, गले बढ़ के लगा ले मुझको,
अपनी ममता भरी जन्नत में छुपा ले मुझको।
यही रास्ता है, और इसके सिवा क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
तेरी अजमत को क्या बढ़ के फ़रिश्तों ने तवाफ़,
और क़दम मैंने उठाए तेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़।
कितना बदबख़्त हूँ, फ़रमान-ए-ख़ुदा भूल गया।
मानता हूँ कि ख़ताकार, गुनहगार हूँ मैं,
तू ख़फ़ा है तो मुसीबत में गिरफ़्तार हूँ मैं।
माफ़ कर दे मुझे, फिर बढ़ के सहारा दे दे,
माँ मेरी डूबती कश्ती को किनारा दे दे।
वरना मुझ जैसा गुनहगार का क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
लोग बीवी के लिए माँ को भुला देते हैं,
उसके जज़्बात को सूली पे चढ़ा देते हैं।
बुज़ुर्ग माँ-बाप के जो काम नहीं आओगे,
अपनी औलाद से तुम इसका सिला पाओगे।
ये अगर बिछड़े तो फिर हाथ कहाँ आएँगे,
रहमतों की लिए सौग़ात कहाँ आएँगे।
हाँ अभी वक़्त है माँ-बाप की ख़िदमत कर लो,
नेकियाँ लूट लो और ख़ुशियों से दामन भर लो।
जाएगा बस वही जन्नत में जो माँ का होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
वास्ता आदम ओ हव्वा का तुझे देता हूँ,
वास्ता शाह-ए-मदीना का तुझे देता हूँ।
वास्ता देता हूँ हैदर की शुजाअत का तुझे,
वास्ता फ़ातिमा ज़हरा की इबादत का तुझे।
तू जो ख़ुश होगी तो ख़ुश होंगे हुसैन और हसन,
वरना वीरान रहेगा मेरे जीवन का चमन।
ऐ मेरी माँ, तू मेरा दूध न बख़्शी अगर,
आग दोज़ख़ की जलाएगी मुझे रह-रह कर।
मरने के बाद ज़रा सोच मेरा क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा।
माँ का दिल टूटे तो आवाज़ ख़ुदा तक जाए,
ये जो रोए तो फ़रिश्तों को भी रोना आए।
माँ के दुख-दर्द को बेटा अगर न समझेगा,
उसका जन्नत में ख़ुदा भी नहीं जाने देगा।
मेरे आका नहीं देंगे उसे जाम-ए-कौसर,
रात-दिन बरसेगी अल्लाह की लानत उस पर।
चाहे हाफ़िज़ हो, या हाजी, या नमाज़ी आलिम,
इसे बेटों से ख़ुदा कैसे हो राज़ी आलम।
जो भला ही नहीं करेगा, तो भला क्या होगा।
माँ तेरे दूध का हक़ हमसे अदा क्या होगा,
तू हो नाराज़ तो खुश हमसे ख़ुदा क्या होगा।
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यह नज़्म माँ की अज़मत, उसके बे-लोस (निस्वार्थ) प्यार, बचपन की कुर्बानियों और उसकी नाशुक्रगुज़ारी करने पर मिलने वाले अज़ाब का बयान है, जिसमें बताया गया है कि माँ की नाराज़गी में ही ख़ुदा की नाराज़गी है।
इस कलाम का मतलब है कि एक माँ अपनी औलाद को पालने के लिए अपनी नींद, भूख और हर सुख-चैन कुर्बान कर देती है। अगर बेटा माँ का दिल दुखाकर बीवी या दुनिया के लिए उसे भुला देता है, तो ख़ुदा उससे नाराज़ हो जाता है और ऐसी औलाद चाहे कितनी भी इबादत कर ले, जन्नत से महरूम (वंचित) ही रहती है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| शर्फ़ (Sharf) | सम्मान या बुलंदी (Honor) |
| अज़मत (Azmat) | महानता या बड़प्पन (Greatness) |
| सितम (Sitam) | ज़ुल्म या अत्याचार (Cruelty) |
| मर्तबा (Martaba) | पद या स्थान (Status/Rank) |
| बदबख़्त (Badbakht) | बदकिस्मत या अभागा (Unfortunate) |
| ख़ताकार (Khatakar) | ग़लती करने वाला या गुनहगार (Sinner) |
| सौग़ात (Saogat) | उपहार या भेंट (Gift) |
| शुजाअत (Shuja'at) | वीरता या बहादुरी (Bravery) |
| दोज़ख़ (Dozakh) | नर्क (Hell) |
शायर कहते हैं कि माँ के दूध का कर्ज़ कोई भी औलाद कभी अदा नहीं कर सकती क्योंकि उसके क़दमों के नीचे जन्नत है। जो लोग बुढ़ापे में माँ-बाप को छोड़ देते हैं, उन्हें अपनी औलाद से भी भविष्य में वही सिला मिलता है; इसलिए वक़्त रहते माँ को मना कर और उनकी सेवा करके अपनी आख़िरत (परलोक) संवार लेनी चाहिए।
शायर के मुताबिक जो लोग बीवी के लिए माँ को भुला देते हैं उनका अंजाम अपनी औलाद से कैसा होता है, और माँ की नाराज़गी पर खुदा का क्या फैसला है?