मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ऐ शहंशाह-ए-मदीना अस्सलातो वस्सलाम
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स) सलात ओ सलाम के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : मौलाना जमील उर रहमान कादरी रहमतुल्लाह अलैह विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 08 Apr, 2023 08:52 AM IST
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ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
बुत-शिकन आया ये कह कर, सर के बल बुत गिर पड़े
झूम कर कहता था काबा...
झूम कर कहता था काबा, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
रब्बी हब्ली उम्मती कहते हुए पैदा हुए
रब ने फ़रमाया के बख्शा...
रब ने फ़रमाया के बख्शा, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
गुंचे चटके, फूल महके, छेड़ छेड़ चहक उठीं बुलबुलें
गुल खिला बाग़-ए-अहद का...
गुल खिला बाग़-ए-अहद का, अस्सलातो वस्सलाम
रौशनी में आमिना ने जिन की देखा मुल्क-ए-शाम
वाह वाह क्या चाँद निकला...
वाह वाह क्या चाँद निकला, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
सर झुका कर बा-अदब इश्क़-ए-रसूलुल्लाह में
कह रहा है हर सितारा...
कह रहा है हर सितारा, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
मोमिनों पढ़ते रहो तुम अपने आका पर दरूद
है फ़रिश्तों का वज़ीफ़ा...
है फ़रिश्तों का वज़ीफ़ा, अस्सलातो वस्सलाम
दस्त-बस्ता सब फ़रिश्ते पढ़ते हैं उन पर दरूद
क्यों न हो फिर विर्द अपना...
क्यों न हो फिर विर्द अपना, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
सर क़लम कर दो मेरा या काट लो मेरी ज़ुबां
मेरी नस नस में बसा है...
मेरी नस नस में बसा है, अस्सलातो वस्सलाम
जब फ़रिश्ते क़ब्र में जलवा दिखाएँ आप का
हो ज़बां पर प्यारे आका...
हो ज़बां पर प्यारे आका, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
मैं वो सुन्नी हूँ जमीले क़ादरी मरने के बाद
मेरा लाशा भी कहेगा...
मेरा लाशा भी कहेगा, अस्सलातो वस्सलाम
ऐ शहंशाह-ए-मदीना, अस्सलातो वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला, अस्सलातो वस्सलाम
(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
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यह अत्यंत मक़बूल और रूहानी नात शरीफ़ मदीने के ताजदार हुज़ूर ﷺ की विलादत (जन्म), उनकी सर्वोच्च अज़मत और उन पर दुरूद-ओ-सलाम भेजने की महानता का एक बेहद ख़ूबसूरत वर्णन है। इसमें आक़ा ﷺ के आगमन से पूरी सृष्टि में फैली नूरानी रौनक़ों को दर्शाया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मदीने के सम्राट और अर्श-ए-मुअल्ला की शोभा (हुज़ूर ﷺ) पर ईश्वर की असीम कृपा और शांति (अस्सलातो वस्सलाम) हो। शायर कहता है कि जब आप इस दुनिया में तशरीफ़ लाए, तो संसार के सारे बुत (मूर्तियाँ) औंधे मुँह गिर पड़े, काबा झूम उठा और आपके नूर के उजाले से माता आमिना ने दूर स्थित 'मुल्क-ए-शाम' (सीरिया) के महलों को भी साफ़-साफ़ देख लिया।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| ज़ीनत | शोभा / रौनक़ या सुंदरता |
| अर्श-ए-मुअल्ला | सर्वोच्च आकाश / ईश्वर का अर्श |
| बुत-शिकन | मूर्तियों को तोड़ने/मिटाने वाला |
| बाग़-ए-अहद | एकेश्वर (अल्लाह) का बाग़ |
| मुल्क-ए-शाम | शाम देश (आधुनिक सीरिया का क्षेत्र) |
| वज़ीफ़ा / विर्द | रोज़ाना पढ़ा जाने वाला पाठ या जाप |
| दस्त-बस्ता | हाथ जोड़कर / अत्यंत अदब के साथ |
| लाशा | मृत शरीर / पार्थिव देह |
इस पावन कलाम का मुख्य सार यह है कि दुरूद-ओ-सलाम पढ़ना स्वयं फ़रिश्तों का नित्य नियम (वज़ीफ़ा) है, इसलिए हर सच्चे मोमिन को इसे अपनी हर साँस का हिस्सा बना लेना चाहिए। आक़ा ﷺ की अपनी उम्मत से ऐसी अनोखी मुहब्बत है कि वे पैदा होते ही 'रब्बी हब्ली उम्मती' (हे रब, मेरी उम्मत को बख़्श दे) की दुआ कर रहे थे। शायर 'जमीले क़ादरी' अपने इश्क़ का इज़हार करते हुए कहते हैं कि उनकी रग-रग में यह सलाम बसा है, और मृत्यु के बाद जब क़ब्र में फ़रिश्ते आक़ा ﷺ का दीदार करवाएँगे, तब भी उनकी ज़बान और उनका लाशा 'अस्सलातो वस्सलाम' ही पुकारेगा।
शायर के मुताबिक नबी ﷺ की पैदाइश के वक़्त उनके लबों पर क्या दुआ थी, और उन्होंने फ़रिश्तों के दुरूद पढ़ने के तरीक़े को क्या नाम दिया है?