मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : पुल से उतारो रह-गुज़र को ख़बर न हो
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
जोड़ा गया : 08 Dec, 2025 02:56 PM IST
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पुल से उतारो रह-गुज़र को ख़बर न हो,
जिब्रील पर बिछाये तो पर को ख़बर न हो
कांटा मेरे जिगर से ग़मे रोज़गार का,
यूँ खींच लीजिए कि जिगर को ख़बर न हो
फ़रियाद उम्मती जो करे हाल-ए-ज़ार में,
मुमकिन नहीं कि ख़ैर-ए-बशर को ख़बर न हो
कहते थे ये बुराक से उसके सबक़रवी,
यूँ जाइए कि गर्द-ए-सफ़र को ख़बर न हो
फ़रमाते हैं ये दोनों हैं सरदार-ए-दो जहाँ,
ऐ मुरतज़ा! अतीक ओ उमर को ख़बर न हो
ऐसा गुमाँ दे उनकी विला में ख़ुदा हमें,
ढूँढा करे पर अपनी ख़बर को ख़बर न हो
आ दिल! हरम को रोकने वालों से छुप के आज,
यूँ उठ चले कि पहलू वब़र को ख़बर न हो
तीर-ए-हरम हैं ये कहें रिश्ता बेपा न हो,
यूँ देखिए कि तारे नज़र को ख़बर न हो
ए ख़ार-ए-तैबा! देख के दामन न भीग जाए,
यूँ दिल में आ के दीद-ए-तर को ख़बर न हो
ए शौक़-ए-दिल! ये सज्दा घर उनको रवाँ नहीं,
अच्छा! वो सज्दा कीजिए सर को ख़बर न हो
उनके सिवा रज़ा कोई है ही नहीं जहाँ,
गुज़रा करे पिसर पे पिदर को ख़बर न हो
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह कलाम आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान द्वारा रचित है, जो ईश्वर के प्रति प्रेम और नबी ﷺ के प्रति अदब (शिष्टाचार) की पराकाष्ठा को दर्शाता है। इसमें हर कार्य को इतनी खामोशी और सूक्ष्मता से करने की बात कही गई है कि स्वयं के अंगों को भी उसका पता न चले।
कवि प्रार्थना करता है कि परलोक के पुल (पुल-ए-सिरात) से उसे इस तरह गुज़ार दिया जाए कि राह को पता भी न चले। वह चाहता है कि उसके दिल से दुनिया के दुखों का कांटा इस नज़ाकत से निकाला जाए कि स्वयं हृदय को भी उसकी आहट न मिले।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| रह-गुज़र | रास्ता या मार्ग |
| ग़मे रोज़गार | दुनिया की परेशानियाँ या जीविका का दुख |
| ख़ैर-ए-बशर | मानवता में सबसे उत्तम (हज़रत मोहम्मद ﷺ) |
| सबक़रवी | तेज़ रफ़्तारी / आगे बढ़ जाना |
| विला | प्रेम या निकटता |
| ख़ार-ए-तैबा | मदीना का कांटा |
| पिदर / पिसर | पिता / पुत्र |
इस नात का सार 'अत्यधिक शिष्टाचार' और 'आत्म-विस्मृति' (खुद को भूल जाना) है। कवि चाहता है कि वह नबी ﷺ की भक्ति में इतना लीन हो जाए कि उसे अपनी सुध-बुध न रहे और उसका हर सज्दा और हर आँसू लोक-दिखावे से कोसों दूर, पूरी तरह गुप्त और रूहानी हो।
क्या आपको 'कांटा निकालने' वाली उपमा (Metaphor) सबसे अधिक प्रभावशाली लगी?
सायर ने ‘खबर न हो' की जो सरते रखी है, क्या आपको ये उनके अदब की इंतेहा नहीं लगती?