मेरे सरकार गुलज़ार-ए-मिल्लत की क्या शान है
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टाइटल : भीनी सुहानी सुबह में ठंडक जिगर की है
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी ओवैस रज़ा कादरी सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
जोड़ा गया : 07 Dec, 2025 04:14 PM IST
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भीनी सुहानी सुबह में ठंडक जिगर की है,
कलियाँ खिली दिलों की हवा ये किधर की है
ख़ुबती हुई नज़र में अदा किस सहर की है,
चुभती हुई जिगर में सदा किस ग़ज़र की है
डालें हरी हरी हैं तो बेलें भरी भरी,
किश्ते अमल पड़ी है ये बारिश किधर की है
हम जाएँ और क़दम से लिपट कर हरम कहें,
सौंपा ख़ुदा को ये अज़्मत किस सफ़र की है
हम गिरदे काबा फिरते थे कल तक और आज वो,
हम पर निसार है ये इरादत किधर की है
कालिक जबीं की सज्दाए दर से छुड़ाओगे,
मुझ को भी ले चलो ये तमन्ना हज़र की है
डूबा हुआ है शौक़ में ज़मज़म और आँख से,
झाले बरस रहे हैं ये हसरत किधर की है
बरसा के जाने वालो पा गौहर करूँ निसार,
अब्रे करम से अर्ज़ ये मिज़ाबे ज़र की है
आगोश-ए-शौक़ खोले हैं जिन के लिए हतीम,
वो फिर के देखते नहीं ये धुन किधर की है
हाँ हाँ रहे मदीना है ग़ाफ़िल ज़रा तू जाग,
वो पाँव रखने वाले ये जान चश्मों सर की है
वारू क़दम क़दम पे का हर दम है जाने नव,
ये राहे जान फ़िज़ा मेरे मौला के दर की है
घड़ियाँ गिनी हैं बरसों की ये शुभ घड़ी फिरी,
मर्मर के फिर ये सिल मेरे सीने से सर की है
अल्लाहो अकबर अपने क़दम और ये ख़ाक-ए-पाक,
हसरत मलाइका को जहाँ वज़ाए सर की है
मे'राज़ का समां है कहाँ पहुँचे ज़ेरो,
कुरसी से ऊँची कुरसी उसी पाक घर की है
उश्शाक रोज़ा सज्दे में सूए हरम झुके,
अल्लाह जानता है कि नीयत किधर की है
ये घर ये दर है उसका जो घर दर से पाक है,
मुज़्दा हो बेघरों के सलाअ अच्छे घर की है
महबूबे रब्बे अर्श है इस सब्ज़ कुब्बा में,
पहलो में जल्वा गाह अत़ीक़ो उमर की है
छाए मलाइका हैं लगातार है दुरूद,
बदले हैं पहरे बदली में बारिश दुरर की है
सदयां का क़िरान है पहलूए माह में,
झुर्मुट किए हैं तारे तजल्ली क़मर की है
सत्तर हज़ार सुबह में सत्तर हज़ार शाम,
यूँ बंदगीए ज़ुल्फ़ो रुख़ आठों पहर की है
जो एक बार आए दुबारा न आएंगे,
रुख़्सत ही बारगाह से बस इस क़दर की है
तड़पा करे बदल के फिर आना कहाँ नसीब,
बे हुक़्म कब मजाल परिंदे को पर की है
ऐ वाए बेकसीए तमन्ना के अब उम्मीद,
दिन को न शाम की है न शब को सहर की है
ये बद्लियाँ न हों तो करोड़ों की आस जाए,
और बारगाह-ए मरहमते आम तर की है
मासूम को है उम्र में सिर्फ़ एक बार बर,
आसी पड़े रहे तो सिला उम्र भर की है
ज़िंदा रहे तो हाज़िरिए बारगाह नसीब,
मर जाएँ तो हयाते अबद ऐश घर की है
मुफ़्लिस और ऐसेया दर से फिरे बेगानी हुए,
चांदी हर एक तरह तो यहाँ गड़िया गर की है
जाना पे तकिया ख़ाक निहाली है दिल निहाल,
हाँ बे-नवाओ खूब ये सूरत गुज़र की है
है छत्रो तख़्त साये-ए दीवारो ख़ाक-ए दर,
शाहो को कब नसीब ये धज करो फ़र की है
इस पाक कू में ख़ाक ये बसर सर-ब-ख़ाक है,
समझे हैं कुछ यही जो हक़ीक़त बसर की है
क्यों ताजदारो! ख़्वाब में देखी कभी ये शै,
जो आज झोलियों में गढ़ायाने दर की है
जारू-कशों में चेहरे लिखे हैं मुलूक के,
वो भी कहाँ नसीब फ़क़त नाम भर की है
तैबा में मर के ठंडे चले जाओँ आँखें बंद,
सीधी सड़क ये शहर-ए शफ़ाअत नगर की है
आसी भी हैं चाहिते ये तैबा है ज़ाहिदो!
मक्का नहीं कि जाँच जहाँ ख़ैर ओ शर की है
शाने जमाल तैबा जाना है नफ़ा महज़
वुसअत जलाल-ए मक्का में सूदो ज़र की है
काबा है बेशक अंजुम-आरा दुल्हन मगर,
सारी बहार दुल्हनों में दुल्हा के घर की है
काबा दुल्हन है तुर्बते अतहार नई दुल्हन,
ये रश्क-ए-आफ़्ताब वो गैरत क़मर की है
दोनों बनी सजीली अनेली बनी मगर,
जो पिया के पास है वो सुहागन कुँवर की है
सर सब्ज़े वस्ल ये है सियापोशी हिज्र वो,
चमकी दुपट्टों से है जो हालत जिगर की है
मा वो शुमा तो क्या कि ख़लील-ए जलील को,
कल देखना कि उन से तमन्ना नज़र की है
अपना शरफ़ दुआ से है बाकी रहा क़बूल,
ये जाने उनके हाथ में कुंजी असर की है
जो चाहे उनसे माँग कि दोनों जहाँ की ख़ैर,
ज़र ना-ख़रीदा एक कनीज़ उनके घर की है
रूमी ग़ुलाम दीन हब्शी बांदियाँ शबे,
गिनती कनीज़ज़ादों में शामो सहर की है
इतना अजब बुलंदिए जन्नत पे किस लिए,
देखा नहीं कि भीख ये किस ऊँचे घर की है
अर्श-ए-बरी पे क्यों न हो फ़िरदौस का दिमाग़,
उतरी हुई शबीह तेरे बामो दर की है
वो ख़ुल्द जिसमें उतरेगी अब्रार की बारात,
अदना निछावर उस मेरे दुल्हा के सर की है
अंबर ज़मीन अबीर हुआ मुश्क-तर ग़ुबार,
अदना सी ये शनाख़्त तेरी राहगुज़र की है
सरकार हम गँवारों में तर्ज़-ए-अदब कहाँ,
हमको तो बस तमीज़ यही भीख भर की है
माँगेंगे माँगे जाएँगे मुँह माँगी पाएंगे,
सरकार में न लाज़ है न हाजत अगर की है
उफ़ बे-हयायी का ये मुँह और तेरे हुज़ूर,
हा तू करीम है तेरी ख़ू दरगुज़र की है
तुझ से छुपाऊँ मुँह तो करूँ किस के सामने,
क्या और भी किसी से तवक़्क़ो नज़र की है
जाऊँ कहाँ पुकारूँ किसे किसका मुँह ताकूँ,
क्या पूछताछ और जा भी सगे बे-हुनर की है
बाब-ए-अता तो ये है जो बहका इधर उधर,
कैसी ख़राबी उस नगाड़े दर-ब-दर की है
आबाद एक दर है तेरा और तेरे सिवा,
जो बारगाह देखिए ग़ैरत खंडर की है
लबवा है आँखें बंद हैं फैली हैं झोलियाँ,
कितने मज़े की भीख तेरे पाक दर की है
घेरा अँधेरियों ने दूहा है चाँद की,
तन्हा हूँ काली रात है मंज़िल ख़तर की है
क़िस्मत में लाख पेच हों सौ बल हज़ार कज,
ये सारी गुंथी इक तेरी सीधी नज़र की है
ऐसी बंधी नसीब खुलें मुश्किलें खुली,
दोनों जहाँ में धूम तुम्हारी कमर की है
जन्नत न दे न दे तेरी रुऐयत हो ख़ैर से,
इस ग़ुल के आगे किसको हवस बर्ग़-ओ-बर की है
शरबत न दे न दे तो करे बात लुत्फ़ से,
ये शहद हो तो फिर किसे परवा शकर की है
मैं खाना-ज़ाद कोहना हूँ सूरत लिखी हुई,
बंदों कनीज़ों में मेरे मदर पिदर की है
मँगता का हाथ उठते ही दाता की दैन थी,
दूरी क़ुबूल-ओ-अर्ज़ में बस हाथ भर की है
सँकी वो देख बादे शफ़ाअत की दे हवा,
ये आब्रू रज़ा तेरे दामान-ए-तर की है
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह विशाल और ऐतिहासिक नात आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान द्वारा मदीना की यात्रा के दौरान लिखी गई थी। इसमें मदीना की सुबह, वहाँ की रूहानियत और हुज़ूर ﷺ के प्रति अगाध प्रेम को शब्दों में पिरोया गया है।
कवि कहता है कि मदीना की भीनी-भीनी सुबह दिल को ठंडक पहुँचाने वाली है। वह काबा और मदीना का बहुत सुंदर वर्णन करते हुए कहता है कि काबा बेशक एक सजीली दुल्हन की तरह है, लेकिन असल रौनक और 'सुहाग' तो दूल्हे (नबी ﷺ) के घर यानी मदीना से है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| भीनी | कोमल और महकती हुई |
| ग़ज़र | सुबह का घंटा/आवाज |
| मिज़ाब-ए-ज़र | काबा का सोने का परनाला |
| सब्ज़ क़ुब्बा | गुंबद-ए-ख़ज़रा (हरा गुंबद) |
| दुरर | मोती (Pearls) |
| शफ़ाअत | सिफारिश (पापों की क्षमा के लिए) |
| गड़िया गर | भिखारी / याचक |
| मदर-पिदर | माता और पिता |
इस कलाम का सारांश यह है कि मदीना की धूल और वहाँ की गलियाँ दुनिया के शाही महलों और तख्तों से कहीं श्रेष्ठ हैं। कवि स्पष्ट करता है कि जन्नत की सुंदरता भी नबी ﷺ के घर की परछाई मात्र है। अंत में वह विश्वास व्यक्त करता है कि दाता (नबी ﷺ) के यहाँ अर्ज़ करने और उसके क़बूल होने में बस 'हाथ उठाने' भर की दूरी है।
काबा को 'दुल्हन' और मदीना को 'दूल्हे का घर' कहने का यह अंदाज़ क्या आपको अद्भुत नहीं लगा?