मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ज़िन्दगी ये नहीं है किसी के लिए
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अख्तर रज़ा खान अज़हरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 05 Aug, 2023 10:44 AM IST
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ज़िन्दगी ये नहीं है किसी के लिए,
ज़िन्दगी है नबी की, नबी के लिए।
ना-समझ मरता है ज़िन्दगी के लिए,
जीना मरना है सब कुछ नबी के लिए।
चाँदनी चार दिन है सभी के लिए,
है सदा चाँद अब्दुन नबी के लिए।
"अंता फीहिम" के दामन में मुनकिर भी हैं,
हम हैं इश्रत-ए-दाइमी के लिए।
ऐश कर लो यहाँ मुनकिरो चार दिन,
मर के तरसोगे इस ज़िन्दगी के लिए।
दाग़-ए-इश्क़-ए-नबी ले चलो क़ब्र में,
है चराग़-ए-लहद रौशनी के लिए।
नक़्श-ए-पा-ए-सगान-ए-नबी देखिए,
ये पता है बहुत रहबरी के लिए।
मसलक-ए-आला हज़रत सलामत रहे,
एक पहचान दीन-ए-नबी के लिए।
मसलक-ए-आला हज़रत पे क़ायम रहो,
ज़िन्दगी दी गई है इसी के लिए।
सुल्ह-ए-कुल्ली नबी का नहीं सुन्नियों,
सुन्नी मुस्लिम है सच्चा नबी के लिए।
वो बुलाता है, कोई ये आवाज़ दे,
दम में जा पहुँचूँ मैं हाज़िरी के लिए।
आए नसीम-ए-सबा उन से कह दे ज़रा,
मुतरिब है ग़दा हाज़िरी के लिए।
जिन के दिल में है इश्क़-ए-नबी की चमक,
वो तरसता नहीं चाँदनी के लिए।
जिन के दिल में हैं जलवे तेरे इश्क़ के,
वो हैं नज्म-ए-ज़माँ रौशनी के लिए।
अख़्तर-ए-क़ादिरी खु्ल्द में चल दिया,
ख़ुल्द वो है हर एक क़ादिरी के लिए।
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यह नात-ए-पाक मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझाती है कि एक सच्चे आस्तिक (मोमिन) का जीना और मरना केवल और केवल हुज़ूर ﷺ की मोहब्बत और उनके बताए रास्ते पर चलने के लिए होना चाहिए।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि यह सांसारिक जीवन असल ज़िन्दगी नहीं है, बल्कि वास्तविक जीवन तो नबी ﷺ के प्रति समर्पित होना है। शायर कहता है कि जो लोग अपने दिल में नबी की मोहब्बत की निशानी (दाग़-ए-इश्क़) लेकर क़ब्र में जाएंगे, उनकी क़ब्र में वही प्यार चराग़ बनकर रौशनी करेगा, जबकि नबी के विरोधी (मुनकिर) मृत्यु के बाद इस रूहानी जीवन के लिए तरसेंगे।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| अब्दुन नबी | नबी का सेवक / नबी का बंदा |
| मुनकिर | इनकार करने वाला / विरोधी |
| इश्रत-ए-दाइमी | शाश्वत प्रसन्नता / हमेशा रहने वाली खुशी |
| चराग़-ए-लहद | क़ब्र का दीपक / क़ब्र की रौशनी |
| सगान-ए-नबी | नबी के दर के वफ़ादार (कुत्ते) |
| रहबरी | मार्गदर्शन / रास्ता दिखाना |
| नसीम-ए-सबा | सुबह की ठंडी हवा |
| ख़ुल्द | स्वर्ग / जन्नत |
इस कलाम में 'मसलक-ए-आला हज़रत' पर दृढ़ रहने की सीख दी गई है, क्योंकि इसे ही दीन-ए-नबी की सच्ची पहचान बताया गया है। शायर 'अख़्तर' (ताजुश्शरिया हज़रत अख़्तर रज़ा ख़ान) अंत में कहते हैं कि जिसके दिल में पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के इश्क़ की चमक होती है, वह दुनिया की झूठी चकाचौंध (चाँदनी) का मोहताज नहीं होता और ऐसा सच्चा आशिक़-ए-रसूल मृत्यु के बाद सीधे जन्नत (खु्ल्द) का अधिकारी बनता है।
लिरिक्स के मुताबिक क़ब्र (लहद) में रोशनी के लिए इंसान को अपने साथ क्या लेकर जाना चाहिए?