मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : ये कहती थी घर घर में जा कर हलीमा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : नूर उल हसन
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 19 Aug, 2023 10:47 AM IST
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ये कहती थी घर घर में जा कर हलीमा,
मेरे घर में ख़ैर-उल-वरा आ गए हैं,
बड़े औज पर है मेरा अब मुक़द्दर,
मेरे घर हबीब-ए-ख़ुदा आ गए हैं
उठी चार-सू रहमतों की घटाएँ,
मुअत्तर मुअत्तर हैं सारी फ़ज़ाएँ,
ख़ुशी में ये जिब्रील नग़्मे सुनाएँ,
वो शाफ़े-ए-रोज़-ए-जज़ा आ गए हैं
ये ज़ुल्मत से कह दो कि डेरे उठा ले,
कि हैं हर तरफ़ अब उजाले उजाले,
कहा जिन को हक़ ने सिराज-म्मुनीरा,
मेरे घर वो नूर-ए-ख़ुदा आ गए हैं
मुक़र्रब हैं बेशक ख़लील-ओ-नजी भी,
बड़ी शान वाले कलीम-ओ-मसीह भी,
लिये अर्श ने जिन के क़दमों के बोसे,
वो उम्मी लक़ब मुस्तफ़ा आ गए हैं
है सुन कर सख़ी आप का आस्ताना,
है दामन पसारे हुए सब ज़माना,
नवासों का सदक़ा, निगाह-ए-करम हो,
तेरे दर पे तेरे गदा आ गए हैं
ख़ुदा के करम से नकीरैन आ कर,
कहेंगे ज़ियारत का मुज़्दा सुना कर,
उठो बहर-ए-ता'ज़ीम, नूर-उल-हसन अब,
लहद में रसूल-ए-ख़ुदा आ गए हैं
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यह नात शरीफ़ हज़रत हलीमा सादिया (र.अ.) की उस खुशी का बयान है जब हुज़ूर ﷺ उनके घर तशरीफ़ लाए। इसमें नबी पाक ﷺ की आमद से कायनात में आए बदलावों और उनकी अज़मत को बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में पेश किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हज़रत हलीमा घर-घर जाकर यह खुशखबरी दे रही हैं कि आज मेरा मुक़द्दर चमक गया है क्योंकि अल्लाह के महबूब मेरे घर आए हैं। शायर कहता है कि उनके आने से दुनिया से अंधेरा (ज़ुल्मत) खत्म हो गया है और जन्नत के फरिश्ते भी उनकी आमद के नग़्मे गा रहे हैं।
| शब्द | अर्थ (हिंदी / English) |
|---|---|
| ख़ैर-उल-वरा | तमाम सृष्टि में सबसे बेहतर / Best of creation |
| औज | ऊँचाई या बुलंदी / Zenith or Height |
| शाफ़े-ए-रोज़-ए-जज़ा | कयामत के दिन शफ़ाअत करने वाले / Intercessor on Judgment Day |
| मुअत्तर | खुशबूदार या महका हुआ / Fragrant |
| सिराज-म्मुनीरा | रोशन चिराग़ (नबी ﷺ का लक़ब) / Radiant lamp |
| मुज़्दा | खुशखबरी / Good news |
इस नात का सार यह है कि हुज़ूर ﷺ के आने से पूरी कायनात रहमतों से भर गई है और अंधेरे छँट गए हैं। शायर 'नूर-उल-हसन' कहते हैं कि आप ﷺ की शान इतनी बुलंद है कि अर्श ने भी आपके कदमों को चूमा है। अंत में शायर उम्मीद करता है कि कब्र (लहद) में भी उसे आक़ा ﷺ का दीदार नसीब होगा।
शायर ने अंधेरे (ज़ुल्मत) से क्या करने को कहा है और नबी ﷺ को किस लक़ब (उपाधि) से याद किया है जिनके क़दमों को अर्श ने चूमा?