जहाँ पर नबी का घराना लुटा है
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टाइटल : उनकी महक ने दिल के ग़ुंचे खिला दिए हैं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Aug, 2023 02:17 PM IST
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उनकी महक ने दिल के ग़ुंचे खिला दिए हैं,
जिस राह चल दिए हैं कूचे बसा दिए हैं
एक दिल हमारा क्या है, आज़ार उसका कितना,
तुमने तो चलते-फिरते मुर्दे जगा दिए हैं
उनके निसार कोई कैसे ही रंज में हो,
जब याद आ गए हैं सब ग़म भुला दिए हैं
असरा में गुज़रे जिस दम बेड़े पे क़ुदसियों के,
होने लगी सलामी, परचम झुका दिए हैं
जब आ गई हैं जोश-ए-रहमत पे उनकी आँखें,
जलते बुझा दिए हैं, रोते हँसा दिए हैं
मेरे करीम से गर क़तरा किसी ने माँगा,
दरिया बहा दिए हैं, दुरबे बहा दिए हैं
अल्लाह रे! क्या जहन्नम अब भी न सर्द होगा,
रो-रो के मुस्तफ़ा ने दरिया बहा दिए हैं
मुल्क-ए-सुख़न की शाही तुम को रज़ा मुसल्लम,
जिस सिम्त आ गए हैं सिक्के बिठा दिए हैं
हम से फ़क़ीर भी अब सेहरी को उठते होंगे,
अब तो ग़नी के दर पर बिस्तर जमा दिए हैं
आने दो या डुबो दो, अब तो तुम्हारी जानिब,
कश्ती तुम्हीं पे छोड़ी, लंगर उठा दिए हैं
दूल्हा से इतना कह दो प्यारे सवारी रोको,
मुश्किल में हैं बराती, पुरख़ार ला दिए हैं
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यह नात-ए-पाक आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी की शाहकार रचनाओं में से एक है, जिसमें हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ की अज़मत, उनके मोजिज़ात (चमत्कारों) और उनकी बेमिसाल रहमत व सख़ावत का ज़िक्र किया गया है।
इस कलाम का अर्थ है कि हुज़ूर ﷺ की आमद और उनकी याद से मुर्दा दिलों को नई ज़िंदगी मिलती है और बड़े से बड़ा ग़म दूर हो जाता है। शायर कहता है कि आप ﷺ की रहमत का दरिया इस क़दर वसीह (बड़ा) है कि मांगने वाले को क़तरे के बदले दरिया मिल जाता है और आख़िरत में आपकी शफ़ाअत ही उम्मत को जहन्नम की आग से बचाएगी।
| शब्द (Word) | अर्थ (Hindi / English Meaning) |
|---|---|
| ग़ुंचे | कली / शगूफ़ा (Flower Bud) |
| कूचे | गलियाँ / मोहल्ले (Streets / Lanes) |
| आज़ार | दुख, तकलीफ़ या बीमारी (Pain / Illness) |
| निसार | क़ुर्बान होना / सदक़े जाना (Sacrificed / Devoted) |
| क़ुदसियों | फ़रिश्ते (Angels) |
| दुरबे | दौलत के ढेर (Heaps of wealth) |
| मुल्क-ए-सुख़न | शायरी और अदब की दुनिया (Kingdom of Poetry) |
| मुसल्लम | स्वीकार किया हुआ / माना हुआ (Accepted / Conceded) |
| सिम्त | दिशा / तरफ़ (Direction) |
| ग़नी | दाता / सख़ी / धनवान (Generous / Wealthy) |
| लंगर | कश्ती को रोकने का भारी लोहा (Anchor) |
| पुरख़ार | काँटों से भरा हुआ / मुश्किल रास्ता (Thorny / Difficult) |
हुज़ूर ﷺ की ज़ात पूरी कायनात के लिए सरापा रहमत है; उनकी महक से दिलों के बाग़ खिल उठते हैं और उनके दर से कोई ख़ाली हाथ नहीं लौटता। आला हज़रत फ़रमाते हैं कि मुस्तफ़ा ﷺ के आंसू और उनकी दुआएं जहन्नम की आग को भी ठंडा कर देंगी, इसीलिए एक मोमिन ने अपनी आख़िरत और ज़िंदगी की कश्ती को पूरी तरह उन्हीं के सहारे छोड़ दिया है।
इस नात के मुताबिक, शायर ने अपनी ज़िंदगी की कश्ती का लंगर उठाकर उसे किस के सहारे छोड़ दिया है?