मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 03 Aug, 2023 02:53 PM IST
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उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं,
जिस राह चल दिए हैं, कूचे बसा दिए हैं।
जब आ गए हैं जोश-ए-रहमत पे उनकी आँखें,
जलते बुझा दिए हैं, रोते हँसा दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं।
एक दिल हमारा क्या है, आज़र उसका कितना,
तुमने तो चलते-फिरते मुर्दे जिला दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं।
अल्लाह! क्या जहन्नम अब भी न सर्द होगा,
रो-रो के मुस्तफ़ा ने दरिया बहा दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं।
उनके निसार कोई कैसे ही रंज में हो,
जब याद आ गए हैं, सब ग़म भुला दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं।
आने दो या डुबो दो, अब तो तुम्हारी जानिब,
कश्ती तुम्हीं पे छोड़ी, लंगर उठा दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं।
मेरे करीम से गर क़तरा किसी ने माँगा,
दरिया बहा दिए हैं, दरिया लुटा दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं।
मुल्क-ए-सुख़न के शाही, तुमको रज़ा मुसल्लम,
जिस सिमत् आ गए हो, दरिया बहा दिए हैं।
उनकी महक ने दिल के गुंचे खिला दिए हैं,
जिस राह चल दिए हैं, कूचे बसा दिए हैं।
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यह सुप्रसिद्ध और रूहानी नात-ए-पाक (आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान द्वारा रचित) हुज़ूर ﷺ की पावन सुगंध, उनकी असीम दयालुता और उम्मत (भक्तों) पर उनके परोपकार का अत्यंत सुंदर वर्णन करती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मेरे नबी ﷺ की पवित्र सुगंध ने मुर्झाए हुए दिलों की कलियों (गुंचे) को खिला दिया है, और वे जिस रास्ते से भी गुज़रे, वहाँ के सूने गलियारे (कूचे) हमेशा के लिए आबाद हो गए। उनकी करुणा का यह आलम है कि जब भी उनकी आँखें रहमत के जोश में आईं, उन्होंने नरक की आग में जलते हुओं को बचा लिया और रोते हुओं को हँसा दिया।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| गुंचे | फूलों की कलियाँ |
| कूचे | गलियाँ / मोहल्ले |
| आज़ार | बीमारी / दुःख या तकलीफ़ |
| जिला दिए | जीवित कर दिया / नई ज़िंदगी दी |
| सर्द | ठंडा |
| निसार | कुर्बान या समर्पित होने वाले |
| जानिब | तरफ़ / ओर |
| मुल्क-ए-सुख़न | शायरी और कविता का संसार |
| मुसल्लम | स्वीकार किया हुआ / सर्वमान्य |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के दान और दया की कोई सीमा नहीं है; यदि कोई उनसे एक बूँद (क़तरा) भी माँगता है, तो वे उसे पूरा दरिया लुटा देते हैं। उन्होंने अपनी उम्मत के ग़म में रो-रोकर आंसुओं के ऐसे दरिया बहाए हैं कि जहन्नम की आग भी ठंडी हो जाएगी। अंत में शायर 'रज़ा' कहते हैं कि हमने अपनी जीवन-नैया उन्हीं के भरोसे छोड़ दी है, और यह बात पूरी दुनिया मानती है कि शायरी के संसार में 'रज़ा' ने शब्दों के दरिया बहाए हैं।
लिरिक्स के मुताबिक, नबी-ए-करीम ﷺ ने अपनी उम्मत के लिए रो-रोकर क्या बहा दिए हैं, जिससे जहन्नम की आग भी ठंडी हो जाए?