मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : शहर-ए-नबी तेरी गलियों का नक्शा ही कुछ ऐसा है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अख्तर रज़ा खान अज़हरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Aug, 2023 12:32 PM IST
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शहर-ए-नबी तेरी गलियों का नक्शा ही कुछ ऐसा है,
ख़ुल्द भी है मुश्ताक-ए-ज़ियारत रोज़ा ही कुछ ऐसा है
दिल को सुकून दे, आँख को ठंडक रोज़ा ही कुछ ऐसा है,
फ़र्श-ए-ज़मीन पर अर्श-ए-बारी हो लगता ही कुछ ऐसा है
उनके दर पर ऐसा झुका दिल, उठने का भी अब होश नहीं,
अहल-ए-शरीअत हैं सक़्ता में, सज्दा ही कुछ ऐसा है
सिब्त-ए-नबी है पुष्त-ए-नबी पर और सजदे की हालत है,
आका ने तस्हीह बढ़ा दी, बेटा ही कुछ ऐसा है
ताज को अपने क़ासिद बना कर हाज़िर हैं शाहान-ए-जहाँ,
उनकी अता ही कुछ ऐसी है, सदक़ा ही कुछ ऐसा है
अर्शे-मुअल्ला सर पे उठाए तायर-ए-सिदरा आँख लगाए,
पत्थर भी क़िस्मत चमकाए, तलवा ही कुछ ऐसा है
रब के सिवा देखा न किसी ने, फ़र्शी हो या अर्शी हो,
उनकी हक़ीक़त के चेहरे पर पर्दा ही कुछ ऐसा है
ख़म हैं यहाँ जमशेद ओ सिकंदर, इसमें क्या हैरानी है,
उनके ग़ुलाम का ऐ अख्तर रुतबा ही कुछ ऐसा है
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यह बेहद ख़ूबसूरत नात-ए-पाक हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ के मुक़द्दस शहर मदीना, उनके रौज़ा-ए-अन्वर की अज़मत और उनकी बेमिसाल रूहानियत का एक आला बयान है।
इस कलाम का अर्थ है कि शहर-ए-नबी ﷺ की गलियों का नक़्शा इतना हसीन है कि स्वयं जन्नत (ख़ुल्द) भी उसकी ज़ियारत के लिए तरसती है, और उनका रौज़ा ज़मीन पर होते हुए भी अर्श का नज़ारा देता है। शायर कहता है कि उनके दर पर आशिक़ इस तरह सज्दे में गिरते हैं कि शरीअत के जानकार (अहल-ए-शरीअत) भी उनके इस गहरे इश्क़ को देखकर हैरान रह जाते हैं।
| शब्द (Word) | अर्थ (Hindi / English Meaning) |
|---|---|
| ख़ुल्द | जन्नत या स्वर्ग (Paradise) |
| मुश्ताक-ए-ज़ियारत | दीदार या दर्शन का चाहने वाला (Desirous of visiting) |
| सक़्ता | अचंभा, विस्मय या हैरान रह जाना (In a state of awe / shock) |
| सिब्त-ए-नबी | नबी के नवासे — यहाँ मुराद इमाम हुसैन (र.अ.) से है (Grandson of the Prophet) |
| पुश्त | पीठ (Back) |
| शाहान-ए-जहाँ | दुनिया के बड़े-बड़े राजा और बादशाह (Kings of the world) |
| तायर-ए-सिदरा | सिदरा का पक्षी — यहाँ मुराद हज़रत जिब्रील (अ.स.) से है (Angel Jibreel) |
| ख़म | झुका हुआ (Bowed) |
इस नात में बताया गया है कि सरकार ﷺ का दरबार वह आला मुक़ाम है जहाँ दुनिया के बड़े-बड़े राजा (जमशेद और सिकंदर) भी अपने ताज को भिखारी का प्याला बनाकर हाज़िर होते हैं। शायर 'अख़्तर' फ़रमाते हैं कि जब उनके अदना ग़ुलामों का मर्तबा और रुतबा दुनिया में इतना ऊँचा है, तो उनके आक़ा ﷺ की अज़मत और हक़ीक़त का अंदाज़ा कोई इंसान या फ़रिश्ता नहीं लगा सकता।
इस नात के मुताबिक, जब नबी-ए-करीम ﷺ की पुश्त (पीठ) पर उनके नवासे (सिब्ते नबी) बैठे थे, तो आक़ा ने किस चीज़ को बढ़ा दिया था?