मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : सरवर कहूं कि मालिको मौला कहूं तुझे
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : कलामे आलाहज़रत (इमाम अहमद रज़ा)
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी नदीम रज़ा फ़ैज़ी ओवैस रज़ा कादरी सज्जाद निज़ामी (मरहूम) विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 10 Jun, 2023 02:16 PM IST
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सरवर कहूं कि मालिको मौला कहूं तुझे,
बाग़े ख़लील का गुले ज़ैबा कहूं तुझे
ह़िरमां नसीब हूं तुझे उम्मीदे गह कहूं,
जाने मुरादो काने तमन्ना कहूं तुझे
गुलज़ारे क़ुद्स का गुले रंगी अदा कहूं,
दरमाने दर्दे बुलबुले शैदा कहूं तुझे
सुब्ह़े वत़न पे शामे ग़रीबां को दूं शरफ़,
बेकस नवाज़ गेसूओं वाला कहूं तुझे
अल्लाह रे तेरे जिस्मे मुनव्वर की ताबिशें,
ऐ जाने जां मैं जाने तजल्ला कहूं तुझे
बे दाग़ लालह या क़-मरे बे कलफ़ कहूं,
बे ख़ार गुलबुने चमन-आरा कहूं तुझे
मुजरिम हूं अपने अ़फ़्व का सामां करूं शहा,
यानी शफ़ीअ़ रोज़े जज़ा का कहूं तुझे
इस मुर्दा दिल को मुज़्दा ह़याते अबद का दूं,
ताबो तुवाने जाने मसीह़ा कहूं तुझे
तेरे तो वस्फ़ ऐ़बे तनाही से हैं बरी,
ह़ैरां हूं मेरे शाह मैं क्या क्या कहूं तुझे
कह लेगी सब कुछ उन के सना ख़्वां की ख़ामुशी,
चुप हो रहा है कह के मैं क्या क्या कहूं तुझे
लेकिन रज़ा ने ख़त्म सुख़न इस पे कर दिया,
ख़ालिक़ का बन्दा ख़ल्क़ का आक़ा कहूं तुझे
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यह आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान बरेलवी द्वारा रचित उर्दू साहित्य की सबसे सुंदर और प्रसिद्ध नातों में से एक है। इसमें पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की बेमिसाल रूहानी महानता, सुंदरता और उनके सर्वोच्च मर्तबे की बेहद अक़ीदत के साथ प्रशंसा की गई है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि कवि दुविधा और गहरे विस्मय में है कि वह नबी ﷺ की महिमा को किन शब्दों में बयां करे—उन्हें संसार का स्वामी कहे, मसीहा कहे, या जन्नत का महकता फूल कहे। अंत में, वह निष्कर्ष निकालता है कि उनकी प्रशंसा इंसानी शब्दों की सीमाओं से परे है, इसलिए उन्हें 'सृष्टिकर्ता (अल्लाह) का परम बंदा और इस पूरी कायनात का आक़ा' कहना ही सबसे उत्तम है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सरवर / मौला | सरदार / मालिक या स्वामी |
| गुले ज़ैबा | अत्यंत सुंदर फूल |
| काने तमन्ना | इच्छाओं की ख़ान / उम्मीदों का केंद्र |
| जिस्मे मुनव्वर की ताबिशें | प्रकाशमान शरीर की चमक (चमकता हुआ नूर) |
| शफ़ीअ़ रोज़े जज़ा | कयामत (न्याय के दिन) के दिन पापों की माफ़ी कराने वाले |
| वस्फ़ | गुण / विशेषताएँ या प्रशंसा |
| ख़ालिक़ / ख़ल्क़ | पैदा करने वाला (ईश्वर) / पूरी सृष्टि या संसार |
इस नात-ए-पाक का मुख्य सार यह है कि हुज़ूर ﷺ का व्यक्तित्व और उनके गुण असीमित (ऐबे-तनाही से बरी) हैं, जिनकी पूरी तारीफ़ करना किसी इंसान के बस में नहीं है। वे बेसहारा लोगों के मददगार, पापियों की माफ़ी का ज़रिया (शफ़ीअ़) और हर मुर्दा दिल को नया जीवन देने वाले आत्मिक मसीहा हैं। आला हज़रत (रज़ा) अपने शब्दों को इस सुंदर सत्य पर समाप्त करते हैं कि आप ईश्वर के सबसे प्रिय और आज्ञाकारी बंदे हैं, और ईश्वर के बाद इस पूरी सृष्टि के सबसे बड़े आक़ा व मार्गदर्शक हैं।
लिरिक्स के आखिरी शेर में, आला हज़रत ने नबी ﷺ को किसका बंदा और किसका आक़ा कहा है?