मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 08 Apr, 2023 09:42 AM IST
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मेरे आका मदीने बुला लीजिए
मेरे आका मदीने बुला लीजिए
सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए
तैबा के जाने वाले, जाकर बड़े अदब से
मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म, कहना शाह-ए-अरब से
कहना के शाह-ए-आलम, इक रंजो-ग़म का मारा
दोनों जहाँ में जिसका है आप ही सहारा
हालात-ए-पूर-अलम से, इस दम गुज़र रहा है
और काँपते लबों से फ़रियाद कर रहा है
पाए गुनाह अपना है दोश पर उठाए
कोई नहीं है ऐसा जो पूछने को आए
भुला हुआ मुसाफ़िर मंज़िल को ढूंढता है
तारिकियों में माह-ए-कामिल को ढूंढता है
सीने में है अंधेरा, दिल है सियाह खाना
ये है मेरी कहानी सरकार को सुनाना
कहना मेरे नबी से महरूम हूँ ख़ुशी से
सरवर क़ब्र-ए-ग़म है, अश्कों से आँख नम है
पामाल-ए-ज़िंदगी हूँ, सरकार उम्मती हूँ
उम्मत के रहनुमा हो, कुछ अर्ज़-ए-हाल सुन लो
फ़रियाद कर रहा हूँ, मैं दिल फिगार कब से
मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शाह-ए-अरब से
हुज़ूर ऐसा कोई इंतज़ाम हो जाए
सलाम के लिए हाज़िर ग़ुलाम हो जाए
सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए
मेरा दिल तड़प रहा है, मेरा जल रहा है सीना
के दवा वही मिलेगी, मुझे ले चलो मदीना
नहीं माल-ओ-ज़र तो क्या है, मैं ग़रीब हूँ यही ना
मेरे इश्क़ मुझे ले चल, तू ही जानिब-ए-मदीना
आका ना टूट जाए, ये दिल का आबगीना
अब के बरस भी मौला, रह जाऊँ मैं कहीं ना
दिल रो रहा है जिनका, आँसू छलक रहे हैं
उन आशिक़ों का सदक़ा बुलवाईये मदीना
मेरे आका मदीने बुला लीजिए
मेरे आका मदीने बुला लीजिए
मदीने जाऊँ, फिर आऊँ, दोबारा फिर जाऊँ
ये ज़िंदगी मेरी यूँ ही तमाम हो जाए
सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए
ऐ आज़म-ए-मदीना, जाकर नबी से कहना
सोज़-ए-ग़म-ए-आलम से अब जल रहा है सीना
कहना के बढ़ रही है अब दिल की इज़्तराबी
क़दमों से दूर हूँ मैं, क़िस्मत की है ख़राबी
कहना के दिल में मेरे अरमान भरे हुए हैं
कहना के हसरतों के नश्तर चुभे हुए हैं
है आरज़ू ये दिल की, मैं भी मदीने जाऊँ
सुलतान-ए-दो जहाँ को दाग़-ए-जिगर दिखाऊँ
काटूँ हज़ार चक्कर तैबा की हर गली के
यूँ ही गुज़ार दूँ मैं अय्याम ज़िंदगी के
फूलों पे जान निसारूँ, काँटों पे दिल को वारूँ
ज़र्रों को दूँ सलामी, दर की करूँ ग़ुलामी
दीवार-ओ-दर को चूमूँ, चौखट पे सर को रख दूँ
रौज़े को देख कर मैं रोता रहूँ बराबर
आलम के दिल में है ये हसरत न जाने कब से
हम सब के दिल में है ये हसरत न जाने कब से
मेरा भी क़िस्सा-ए-ग़म कहना शाह-ए-अरब से
सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए
एक रोज़ होगा जाना सरकार की गली में
होगा वही ठिकाना सरकार की गली में
दिल में नबी की यादें, लब पर नबी की नाअतें
जाना तो ऐसे जाना सरकार की गली में
या मुस्तफ़ा खुदारा दो इज़्न हाज़िरी का
कर लूँ नज़ारा आकर मैं आप की गली का
एक बार तो दिखा दो रमज़ान में मदीना
इस बार तो दिखा दो रमज़ान में मदीना
आका हमें दिखा दो रमज़ान में मदीना
बेशक बना लो आका मेहमान दो घड़ी का
नसीब वालों में मेरा भी नाम हो जाए
जो ज़िंदगी की मदीने में शाम हो जाए
सहारा चाहिए सरकार ज़िंदगी के लिए
तड़प रहा हूँ मदीने की हाज़िरी के लिए
बुला लो ना, बुला लो ना
आका... आका... आका...
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यह दिलकश नात शरीफ़ मदीना मुनव्वरा की हाज़िरी के लिए एक व्याकुल आशिक़-ए-रसूल के दिल की तड़प और करुण पुकार है। इसमें एक बेबस उम्मती अपने गुनाहों का बोझ और जीवन के दुखों से परेशान होकर आक़ा ﷺ के दरबार में बुलाए जाने की भावुक भीख मांग रहा है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि शायर मदीना जाने वाले मुसाफ़िरों से मनुहार करता है कि वे मदीने के सुल्तान (हुज़ूर ﷺ) से उनके दुखों का हाल कहें। वह कहता है कि भले ही उसके पास धन-दौलत (माल-ओ-ज़र) नहीं है, लेकिन दिल में आक़ा ﷺ के लिए बेपनाह मोहब्बत है, इसलिए उसकी यही अंतिम इच्छा है कि उसके जीवन की आख़िरी शाम मदीने की मुक़द्दस गलियों में ही बीते।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| पूर-अलम | दुखों से भरा हुआ / अत्यंत कष्टदायी |
| माह-ए-कामिल | पूर्णिमा का चाँद (यहाँ इशारा हुज़ूर ﷺ की पवित्र ज़ात से है) |
| दिल फ़िगार | टूटे हुए दिल वाला / दुखी |
| माल-ओ-ज़र | धन-दौलत और सोना |
| आबगीना | काँच का पात्र / दर्पण (यहाँ दिल के लिए प्रयुक्त) |
| आज़म-ए-मदीना | मदीना जाने का पक्का इरादा करने वाला यात्री |
| इज़्तराबी | बेचैनी / व्याकुलता |
| इज़्न | अनुमति / आज्ञा या इज़ाज़त |
इस भावपूर्ण नात का सार यह है कि दुनिया की मुसीबतों और अपने पापों से थका हुआ हर मोमिन केवल हुज़ूर ﷺ की दया का आकांक्षी है। शायर की दिली तमन्ना है कि उसे कम से कम एक बार पवित्र रमज़ान के महीने में मदीने का दीदार नसीब हो। वह आक़ा ﷺ से बार-बार मदीने बुलाने की इल्तिज़ा करता है ताकि वह उनकी चौखट पर अपना सर रख सके और उसकी पूरी ज़िंदगी हुज़ूर ﷺ की ग़ुलामी और नाअत पढ़ते हुए ही तमाम (समाप्त) हो जाए।
शायर ने 'माह-ए-कामिल' शब्द का इस्तेमाल किसके लिए किया है, और वह रमज़ान के महीने में क्या ख़्वाहिश पूरी करना चाहता है?