मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : फूलों की सेज मेरी हर एक रह गुज़र में है
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
नातख्वान/कलाकार: सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
जोड़ा गया : 07 Apr, 2023 07:54 AM IST
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फूलों की सेज मेरी हर एक रह गुज़र में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
ना हो आराम जिस बीमार को सारे ज़माने से
उठा ले जाए थोड़ी खाक़ उनके आस्ताने से
रहमत फ़रिश्ते लाते रहेंगे हर एक पल
बरकत गुल खिलाते रहेंगे हर एक पल
खाक़ ए दरे रसूल अगर तेरे घर में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
नूर के चश्मे लहराये दरिया बहे
उंगलियों की करामत पे लाखों सलाम
उट्ठी जो उनकी उंगली तो क्या क्या ना कर दिया
सूरज को फेरा चांद को दो टुकड़े कर दिया
उसका निशान आज भी देखो क़मर में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
भीनी सुहानी सुब्हो की ठन्डक जिगर की है
कलियां खिलीं दिलों की हवा ये किधर की है
रेशम सी हैं हवाएं फ़ज़ा मुश्कवार है
तैबा की जुस्तजू में अजब ही खुमार है
लगता है जैसे खुल्द मेरी हर डगर में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
फूलों की सेज मेरी! हर एक रह गुज़र में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
सरवर कहूँ के मालिक-ओ-मौला कहूँ तुझे
बाग़े ख़लील का गुल-ए-ज़ेबा कहूँ तुझे
लेकिन रज़ा ने ख़त्म-ए-सुख़न इस पे कर दिया
ख़ालिक का बंदा, ख़ल्क़ का आका कहूँ तुझे
अल्लाह सबसे आला है फिर मुस्तफ़ा की ज़ात
दोनों जहां में ऊंची है मेरे नबी की बात
फैला हुआ जो नूर ये शाम ओ सहर में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
फूलों की सेज मेरी हर एक रह गुज़र में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
मेरे तसव्वुरात का आलम ना पूछिये
क्यूँ हो गई है आंख मेरी नम ना पूछिये
सज्जाद मस्त नात ए शहे बहरोबर में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
फूलों की सेज मेरी हर एक रह गुज़र में है
मैं हूं सफ़र में गुंम्बदे खज़रा नज़र में है
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यह नात शरीफ़ मदीना मुनव्वरा और 'गुंबद-ए-ख़ज़रा' (हरे गुंबद) के गहरे तसव्वुर (कल्पना) में डूबे एक आशिक़-ए-रसूल की रूहानी कैफ़ियत को बयां करती है। इसमें आक़ा ﷺ के चमत्कारी मोज़िज़ों, उनके दर की धूल की शिफ़ा और उनकी सर्वोच्च अज़मत का बहुत ही भावपूर्ण ज़िक्र किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि शायर भले ही किसी भी सांसारिक सफ़र में हो, लेकिन उसके अंतर्मन में हमेशा मदीने का पवित्र हरा गुंबद रहता है, जिसकी याद से उसकी मुश्किल राहें भी फूलों की सेज जैसी आसान हो जाती हैं। नबी ﷺ की उंगलियों की करामत ऐसी महान है कि उन्होंने डूबते सूरज को पलटा और चाँद के दो टुकड़े कर दिए, जिसका निशान आज भी आसमान के चाँद (क़मर) पर गवाही दे रहा है।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| रह गुज़र / डगर | रास्ता / मार्ग या राह |
| गुंबद-ए-ख़ज़रा | मदीना शरीफ़ का पवित्र हरा गुंबद |
| खाक़ / आस्ताने | धूल या मट्टी / पवित्र चौखट या दरबार |
| दरे रसूल | अल्लाह के रसूल ﷺ का दरवार |
| क़मर | चंद्रमा / चाँद |
| मुश्कवार | कस्तूरी जैसी पवित्र ख़ुशबू से महकती हुई |
| ख़ुल्द | स्वर्ग / जन्नत |
| ख़ालिक / ख़ल्क़ | सृष्टि की रचना करने वाला (ईश्वर) / समस्त सृष्टि या संसार |
इस मुक़द्दस कलाम का मूल सार यह है कि आक़ा ﷺ के दरबार की धूल में वो शिफ़ा (आरोग्य) है जो दुनिया की किसी दवा में नहीं। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान के सुप्रसिद्ध शेर का हवाला देते हुए शायर कहता है कि हुज़ूर ﷺ ईश्वर के प्रिय बंदे और पूरी कायनात के स्वामी (आक़ा) हैं। अंत में, शायर 'सज्जाद' नबी ﷺ की याद और तैबा की हवाओं के ख़ुमार में इस क़दर खोए हैं कि उनकी आँखों से इश्क़-ए-रसूल में आँसू छलक आते हैं और उन्हें अपनी हर डगर पर जन्नत का अहसास होता है।
शायर ने नबी ﷺ की उंगलियों की किस मोज़ज़ाती (चमत्कारी) करामत का ज़िक्र किया है जिसका निशान आज भी 'क़मर' (चाँद) पर मौजूद है?