मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : फिर करम हो गया मैं मदीने चला
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : ओवैस रज़ा कादरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 18 Apr, 2023 09:49 PM IST
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मैं मदीने चला, मैं मदीने चला,
फिर करम हो गया, मैं मदीने चला
कैफ़ सा छा गया, मैं मदीने चला,
झूमता झूमता मैं मदीने चला
साक़िया! मय पिला, मैं मदीने चला,
मस्त-ओ-बेख़ुद बना, मैं मदीने चला
क्या बताऊँ मिली दिल को कैसी ख़ुशी,
जब ये मुज़्दा सुना, मैं मदीने चला
अश्क थमते नहीं, पाँव जमते नहीं,
लड़खड़ाता हुआ मैं मदीने चला
ऐ शजर! ऐ हजर! तुम भी, शम्स-ओ-क़मर!
देखो देखो ज़रा, मैं मदीने चला
देखें तारे मुझे, ये नज़ारे मुझे,
तुम भी देखो ज़रा, मैं मदीने चला
रूह-ए-मुज़्तर! ठहर, तू निकलना उधर,
इतनी जल्दी है क्या, मैं मदीने चला
हाथ उठते रहे, मुझ को देते रहे,
वो तलब से सिवा, मैं मदीने चला
नूर-ए-हक़ के हुज़ूर, अपने सारे क़ुसूर,
बख़्शवाने चला, मैं मदीने चला
मेरे सिद्दीक़'उमर! हो सलाम आप पर,
और रहमत सदा, मैं मदीने चला
वो उहुद की ज़मीं, जिस के अंदर मकीं,
मेरे हम्ज़ा पिया, मैं मदीने चला
वो बक़ी की ज़मीं, जिस के अंदर मकीं,
मेरे मदनी ज़िया, मैं मदीने चला
गुंबद-ए-सब्ज़ पर जब पड़ेगी नज़र,
क्या सुरूर आएगा, मैं मदीने चला
उन के मीनार पर जब पड़ेगी नज़र,
क्या सुरूर आएगा, मैं मदीने चला
मिंबर-ए-नूर पर जब उठेगी नज़र,
क्या सुरूर आएगा, मैं मदीने चला
उन का ग़म, चश्म-ए-तर और सोज़-ए-जिगर,
अब तो दे दे, ख़ुदा! मैं मदीने चला
दर्द-ए-उल्फ़त मिले, ज़ौक़ बढ़ने लगे,
जब चले क़ाफ़िला, मैं मदीने चला
मेरे आक़ा का दर होगा पेश-ए-नज़र,
चाहिए और क्या! मैं मदीने चला
सब्ज़-गुंबद का नूर ज़ंग कर देगा दूर,
पाएगा दिल जिला, मैं मदीने चला
मेरे गंदे क़दम और उन का हरम,
लाज रखना, ख़ुदा! मैं मदीने चला
क्या करेगा इधर, बाँध रख़्त-ए-सफ़र,
चल, 'उबैद-ए-रज़ा! मैं मदीने चला
लुत्फ़ तो जब मिले, मुझ से मुर्शिद कहें,
चल, उबैद-ए-रज़ा! मैं मदीने चला
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यह चश्तिया और कादरिया रंग में डूबा हुआ एक अत्यंत भावुक और विख्यात नातिया कलाम है, जिसे सूफी कवि 'उबैद-ए-रज़ा' ने मदीना शरीफ की यात्रा (हाज़िरी) के रूहानी आनंद और तड़प को व्यक्त करने के लिए लिखा है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि कवि पर पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की असीम कृपा (करम) हो गई है और वह मदीने जाने की ख़ुशी में झूमता हुआ, मदहोश होकर यात्रा पर निकल पड़ा है। कवि का मानना है कि जब उसकी आँखें आक़ा के पवित्र दर और हरे गुंबद (गुंबद-ए-सब्ज़) का दर्शन करेंगी, तो उसके दिल को जो दिव्य आनंद और शांति मिलेगी, उसके आगे संसार के सारे सुख फीके हैं।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| कैफ़ / मुज़्दा | रूहानी मस्ती या नशा / ख़ुशख़बरी (Good news) |
| शजर / हजर / शम्स-ओ-क़मर | पेड़ / पत्थर / सूरज और चाँद |
| रूह-ए-मुज़्तर | तड़पती या बेचैन आत्मा |
| तलब से सिवा | चाहत या उम्मीद से भी कहीं ज़्यादा |
| बक़ी / मकीं | जन्नत-उल-बक़ी (पवित्र क़ब्रिस्तान) / निवास करने वाले |
| दिल जिला | दिल का जीवित होना / मन की शुद्धता |
| रख़्त-ए-सफ़र | यात्रा का सामान या तैयारी |
इस नात-ए-पाक का मुख्य सार यह है कि मदीना शरीफ की हाज़िरी केवल एक भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि आत्मा का शुद्धिकरण है, जहाँ हरे गुंबद का नूर दिल पर जमी पाप की काई (ज़ंग) को धो देता है। कवि स्वयं को गुनहगार मानते हुए ईश्वर से अपनी लाज रखने की दुआ करता है और रास्ते के चाँद-तारों व प्रकृति को अपनी इस महान रूहानी यात्रा का गवाह बनाता है। अंत में, वह सूफियाना अंदाज़ में कहता है कि यात्रा का वास्तविक आनंद (लुत्फ़) तब है, जब उसके आध्यात्मिक गुरु (मुर्शिद) खुद हाथ थामकर कहें कि 'चल उबैद-ए-रज़ा, मैं भी तेरे साथ मदीने चला।'
लिरिक्स के मुताबिक, गुम्बद-ए-ख़ज़रा (सबज़ गुम्बद) का नूर दिल से किस चीज़ को दूर कर देगा?