मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: राव अली हसनैन
जोड़ा गया : 23 Feb, 2024 05:57 AM IST
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शबे बारात, शबे बारात
शबे बारात, शबे बारात
पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है,
जागूँगा सारी रात, इबादत की रात है
पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है
शबे बारात, शबे बारात
शबे बारात, शबे बारात
मर्ज़-ए-गुनाहगारी से तौबा करूँगा मैं,
फ़र्मान-ए-मुस्तफ़ा है, शफ़ाअत की रात है
जागूँगा सारी रात, इबादत की रात है,
पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है
शबे बारात, शबे बारात
शबे बारात, शबे बारात
होगी क़बूल सारे तालबगारों की फरियाद,
बस दिल से पुकारो, ये समाएत की रात है
जागूँगा सारी रात, इबादत की रात है,
पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है
शबे बारात, शबे बारात
शबे बारात, शबे बारात
सजदे करूँगा, अश्क-ए-निदामत बहाऊँगा,
सब कुछ मिलेगा मुझको, इनायत की रात है
जागूँगा सारी रात, इबादत की रात है,
पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है
शबे बारात, शबे बारात
शबे बारात, शबे बारात
सारा जहाँ छोड़ के मस्जिद चलो, नादिम!
रहमत ही रहमतें हैं, ये बरकत की रात है
जागूँगा सारी रात, इबादत की रात है,
पाई शबे बारात ये क़िस्मत की बात है
शबे बारात, शबे बारात
शबे बारात, शबे बारात
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यह कलाम शबे-बारात की अज़मत और उस रात की जाने वाली तौबा की अहमियत का बयान है, जिसमें बताया गया है कि यह रात गुनाहों से पाक होने और खुदा की रहमत समेटने का एक खुशनसीब मौका है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि शबे-बारात नसीब वालों को मिलती है ताकि वे पूरी रात जागकर इबादत कर सकें। शायर कहता है कि गुनाहों की बीमारी का इलाज सच्ची तौबा में है, और चूँकि मुस्तफ़ा ﷺ का फ़रमान है कि यह शफ़ाअत (माफी) की रात है, इसलिए दिल से की गई हर फ़रियाद ज़रूर सुनी जाएगी।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| मर्ज़-ए-गुनाहगारी | गुनाह करने की बीमारी (The disease of sinning) |
| शफ़ाअत | सिफारिश/माफी (Intercession/Recommendation for mercy) |
| तालबगार | चाहने वाला/उम्मीदवार (Seeker) |
| समाअत | सुनने की शक्ति/सुनवाई (Hearing/Listening) |
| अश्क-ए-निदामत | शर्मिंदगी के आँसू (Tears of repentance) |
| इनायत | कृपा/बख्शिश (Blessing/Grace) |
| नादिम | शर्मिंदा होने वाला (शायर का उपनाम) |
इस कलाम का निचोड़ यह है कि इंसान को दुनिया के सारे काम छोड़कर मस्जिद और इबादत की तरफ रुख करना चाहिए। शायर 'नादिम' समझाते हैं कि यदि हम सजदों में गिरकर और पश्चाताप के आँसू बहाकर दुआ माँगते हैं, तो इस बरकत वाली रात में अल्लाह की रहमत से सब कुछ हासिल हो सकता है।
शायर के अनुसार, इस रात को "इबादत की रात" क्यों कहा गया है और इसका ताल्लुक किस्मत से क्या है?