मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: लाइबा फातिमा
जोड़ा गया : 25 Feb, 2024 06:31 AM IST
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नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
फर्श पर धूम है, अर्श पर धूम है
कम-नसीबी है उस की जो महरूम है
फिर मिलेगी ये शब किस को मालूम है
हम पे लुत्फ़े ख़ुदा आज की रात है
नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
मोमिनो आज गंजे-सख़ा लूट लो
लूट लो ऐ मरीज़ो ! शिफ़ा लूट लो
आसियो रहमते मुस्तफ़ा लूट लो
बाब-ए-रहमत खुला आज की रात है
नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
अब्रे रहमत हैं महफ़िल पे छाए हुवे
आसमां से मलाइक हैं आए हुवे
खुद मुहम्मद हैं तशरीफ़ लाए हुवे
किस कदर जां-फ़िज़ा आज की रात है
नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
मांग लो मांग लो चश्मे-तर मांग लो
दर्दे-दिल और हुस्ने-नज़र मांग लो
सब्ज़ गुम्बद के साए में घर मांग लो
मांगने का मज़ा आज की रात है
नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
इस तरफ नूर है, उस तरफ नूर है
सारा आलम मुसर्रत से मा'मूर है
जिस को देखो वही आज मसरूर है
महक उठी फ़ज़ा आज की रात है
नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
वक्त लाए ख़ुदा सब मदीने चलें
लूटने रहमतों के ख़ज़ीने चलें
सब के मंज़िल की जानिब सफ़ीने चलें
मेरी साइम दुआ आज की रात है
नूरी महफ़िल पे चादर तनी नूर की
नूर फ़ैला हुवा आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुवे दो जहां
कौन जल्वा-नुमा आज की रात है
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यह कलाम मुक़द्दस रात शब-ए-बरात की बरकतों को बयान करता है। इसमें ज़मीन से आसमान तक फैले नूर और हुज़ूर ﷺ की रूहानी आमद का ज़िक्र है।
शायर कहता है कि आज की रात पूरी महफ़िल नूरानी हो चुकी है क्योंकि स्वयं रहमत-ए-आलम ﷺ की रूहानी उपस्थिति महसूस हो रही है। वह मोमिनों को दावत देता है कि इस बरकत वाली रात में रूँआसी आँखों (चश्मे-तर) के साथ जो चाहो माँग लो, क्योंकि आज सख़ावत (दानशीलता) का खज़ाना खुला है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जल्वा-नुमा | जिसका जलवा दिखाई दे (उपस्थित) |
| अर्श व फर्श | आकाश और धरती |
| महरूूम | वंचित (जिसे न मिला हो) |
| गंजे-सख़ा | सख़ावत (दान) का खज़ाना |
| बाब-ए-रहमत | दया का दरवाज़ा |
| जां-फ़िज़ा | प्राण फूंकने वाली / ताजगी भरी |
| चश्मे-तर | नम आँखें (आँसू भरी आँखें) |
| मुसर्रत | खुशी / प्रसन्नता |
इस नात का सार यह है कि ऐसी पाक रातें अल्लाह का विशेष उपहार हैं, जिनमें रहमत के बादल छाए होते हैं और माँगने वाले की हर मुराद पूरी होती है। शायर ज़ोर देता है कि वह व्यक्ति अभागा है जो ऐसी रात में भी ख़ुदा के लुत्फ़ और नबी ﷺ की शफ़ाअत से महरूम रह जाए।
नात के आखिर में शायर "साइस" ने क्या दुआ की है, और उन्होंने "मदीने" जाने के हवाले से किन अल्फाज़ का इस्तेमाल किया है?