मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मुख्तार ए कायनात सा दाता कोई नहीं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : असद इक़बाल कलकत्तावी
नातख्वान/कलाकार: असद इक़बाल कलकत्तावी
जोड़ा गया : 11 Sep, 2023 04:41 PM IST
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मुख्तार ए कायनात सा दाता कोई नहीं,
यानी रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
बिन मांगे मेरे आका ने झोली को भर दिया,
मँगता जो आया माँगने सुल्तान कर दिया,
खाली दरे हुजूर से लौटा कोई नहीं,
मेरे रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
यानी रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
फज़ले खुदा से देखिये जीशान हो गये,
आए थे कत्ल करने मुसलमान हो गए,
बोले उमर के आपसा आक़ा कोई नहीं,
मेरे रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
मुख्तार ए कायनात सा दाता कोई नहीं,
यानी रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
सजदे में सर कटा के शाह ए मशरीकेन ने,
एलान कर दिया था ये हज़रत हुसैन ने,
के जैसा मेरे नाना है वैसा कोई नहीं,
मेरे रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
मुख्तार ए कायनात सा दाता कोई नहीं,
यानी रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
रुहूल अमीन सिदरा तलक जा के थम गए,
सिदरा से आगे देखिये शाह ए उमम गए,
मेरे रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
पहुंचे जहां नबी वहां पहुंचा कोई नहीं,
मेरे रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
मुख्तार ए कायनात सा दाता कोई नहीं,
यानी रसूल ए पाक के जैसा कोई नहीं
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यह नात शरीफ़ हुज़ूर ﷺ की बेमिसाल अज़मत और उनकी सख़ावत (दानवीरता) का वर्णन करती है, जिसमें उन्हें पूरी कायनात का सबसे बड़ा दाता बताया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि नबी ﷺ के दर से कभी कोई खाली हाथ नहीं गया; उन्होंने मांगने वालों को भी सुल्तान बना दिया। यहाँ तक कि हज़रत उमर (र.आ.) जो विरोध में आए थे, वे भी उनकी रहमत देख कर गुलाम हो गए और सिदरा के आगे सिर्फ हुज़ूर ﷺ की ही पहुँच हुई।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| मुख्तार-ए-कायनात | सृष्टि का स्वामी/अधिकार रखने वाला (Master of the Universe) |
| दर-ए-हुज़ूर | नबी ﷺ की चौखट (Threshold of the Prophet) |
| फ़ज़ल-ए-खुदा | ईश्वर की कृपा (Grace of God) |
| शाह-ए-मशरीकेन | पूर्व के राजा (हज़रत हुसैन के लिए प्रयुक्त) |
| रुहूल अमीन | हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम (Angel Gabriel) |
| थम गए | रुक गए (Stopped) |
इस कलाम का सार यह है कि अल्लाह के रसूल ﷺ जैसा दुनिया में कोई दूसरा नहीं है। उनकी सख़ावत का आलम यह है कि वे बिन माँगे झोलियाँ भर देते हैं और उनकी रूहानी मंज़िल वहां है जहाँ हज़रत जिब्रील (अ.स.) के पर भी जलते हैं। हज़रत हुसैन (र.आ.) ने भी कर्बला में अपने नाना की इसी महानता का ऐलान किया था।
सिदरा-तुल-मुंतहा पर कौन रुक गया था, जबकि हुज़ूर ﷺ उससे भी आगे तशरीफ़ ले गए?