मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मेरे ख़्वाजा का मेला आया
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ डॉ. निसार अहमद मार्फ़ानी
जोड़ा गया : 03 Jan, 2024 09:00 AM IST
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ख़्वाजा पिया! ख़्वाजा पिया!
ख़्वाजा पिया! ख़्वाजा पिया!
अजमेर की सुन्दर नगरी में
वलियों के राजा रहते हैं
उस देश का, यारो! क्या कहना!
जिस देश में ख़्वाजा रहते हैं
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
ज़माना कुछ भी कहे, मेरा आसरा ख़्वाजा
पुकारता ही रहूँगा हमेशा, या ख़्वाजा
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मुझे तो दीन भी, दुनिया भी उनके दर से मिली
ज़माने भर की ख़ुशी उनके रहगुज़र से मिली
क़दम क़दम पे हुए मेरे रहनुमा ख़्वाजा
पुकारता ही रहूँगा हमेशा, या ख़्वाजा
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
ज़माना यूँ ही तो कहता नहीं ग़रीब-नवाज़
तमाम दुनिया में होती है आज नज़र-ओ-नियाज़
कि फ़ैज़-ए-आम जो जारी है आपका, ख़्वाजा!
पुकारता ही रहूँगा हमेशा, या ख़्वाजा
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मैं लड़ रहा हूँ जो तूफ़ान-ए-ग़म की मौजों से
निकल के आया हूँ बहर-ए-आलम की मौजों से
है मेरी कश्ती-ए-हस्ती के ना-ख़ुदा ख़्वाजा
पुकारता ही रहूँगा हमेशा, या ख़्वाजा
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
वही है फ़र्क़ शरीअत में और तरीक़त में
जो सिलसिला है अक़ीदत में और मोहब्बत में
कोई भी शक्ल हो, है इसका आइना ख़्वाजा
पुकारता ही रहूँगा हमेशा, या ख़्वाजा
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
जिन्हें तलाश है हक़ की वो इस तरफ़ आएँ
हज़ूर-ए-ख़्वाजा अक़ीदत के फूल बरसाएँ
रसूल से है ख़ुदा तक का सिलसिला ख़्वाजा
पुकारता ही रहूँगा हमेशा, या ख़्वाजा
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
मेरे ख़्वाजा का मेला आया
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यह कलाम हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (रह.) की शान में पढ़ा जाने वाला एक प्रसिद्ध सूफ़ियाना कलाम है, जो अजमेर शरीफ़ की रूहानी चमक और ख़्वाजा साहब की कृपा का वर्णन करता है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि शायर के लिए उनके मार्गदर्शक और रक्षक केवल ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ हैं, जिनके दर से उन्हें धर्म (दीन) और दुनिया दोनों की सफलता मिली है। वे अपनी जीवन रूपी नैया का माझी (नाव चलाने वाला) ख़्वाजा साहब को मानते हैं, जो उन्हें दुखों के समुद्र से पार लगाते हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| रहगुज़र | रास्ता या मार्ग |
| नज़र-ओ-नियाज़ | भेंट या श्रद्धा का चढ़ावा |
| फ़ैज़-ए-आम | सबकी भलाई के लिए जारी कृपा |
| बहर-ए-आलम | दुखों का सागर |
| कश्ती-ए-हस्ती | जीवन रूपी नाव |
| ना-ख़ुदा | मल्लाह या नाव का चालक |
| हक़ | परम सत्य या ईश्वर |
इस कलाम का सार यह है कि अजमेर शरीफ़ वह पावन नगरी है जहाँ वलियों के राजा (ख़्वाजा ग़रीब नवाज़) का वास है। उनकी उदारता और दया के कारण ही उन्हें 'ग़रीब नवाज़' कहा जाता है, क्योंकि उनके द्वार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता। शायर का मानना है कि ईश्वर तक पहुँचने का आध्यात्मिक मार्ग इन्हीं के माध्यम से होकर गुज़रता है।
शायर ने अपनी "कश्ती-ए-हस्ती" (ज़िन्दगी की नैया) का "ना-ख़ुदा" (माझी) ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ को क्यों कहा है?