मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मेरा अमल है सियाह-नामा मुझे ख़ुदाया मुआफ़ कर दे
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अल्लामा निसार अली उजागर
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी
जोड़ा गया : 18 Apr, 2023 09:19 PM IST
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मौला मेरे मौला! मौला मेरे मौला!
तौबा क़बूल कर ले, तौबा क़बूल कर ले
तौबा क़बूल कर ले, तौबा क़बूल कर ले
मेरा अमल है सियाह-नामा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मैं जानता हूँ, तू बख़्श देगा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
पहाड़ जैसी मेरी ख़ताएँ
मगर बहुत हैं तेरी 'अताएँ
मुआफ़ करना शिआर तेरा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
या रब! तेरे करम, तेरी रहमत का वास्ता
या रब! तेरी अता, तेरी नेमत का वास्ता
या रब! तेरे जलाल-ओ-जलालत का वास्ता
या रब! रसूल-ए-हक़ की रिसालत का वास्ता
अज़ाब दे कर तू क्या करेगा ?
करीम है तू करम ही फ़रमा
सुवाल कैसा, जवाब कैसा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मेरा अमल है सियाह-नामा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मैं जानता हूँ, तू बख़्श देगा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
न देख लग़्ज़िश, तू देख बख़्शिश
करम की बारिश की कर नवाज़िश
मैं आब-ए-बख़्शिश का हूँ पियासा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मेरा अमल है सियाह-नामा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मैं जानता हूँ, तू बख़्श देगा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
अँधेरे शब के किए हैं रुस्वा
उजाले दिन के किए हैं गहना
सरापा जुर्म-ओ-ख़ता हूँ, मौला!
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मेरा अमल है सियाह-नामा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
मैं जानता हूँ, तू बख़्श देगा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
ये हाथ बाँधे, ये सर झुकाए
खड़ा उजागर दर-ए-हरम पर
नवीद-ए-बख़्शिश का दे इशारा
मुझे, ख़ुदाया! मुआफ़ कर दे
या रब! तेरे करम, तेरी रहमत का वास्ता
या रब! तेरी अता, तेरी नेमत का वास्ता
या रब! तेरे जलाल-ओ-जलालत का वास्ता
या रब! रसूल-ए-हक़ की रिसालत का वास्ता
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यह ईश्वर (अल्लाह) की बारगाह में अपनी भूलों की क्षमा याचना के लिए लिखी गई एक अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी 'हम्द' (प्रार्थना) है, जिसमें एक भक्त अपने पापों पर लज्जित होकर सच्चे दिल से तौबा कर रहा है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि एक असहाय बंदा ईश्वर के सामने अपने कर्मों का काला चिट्ठा (सियाह-नामा) स्वीकार कर रहा है और अपनी ग़लतियों को पहाड़ जितना बड़ा बता रहा है। वह कहता है कि भले ही मैं गुनहगार हूँ, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि माफ़ करना ईश्वर का स्वभाव है और वह अपनी असीम दयालुता से उसे ज़रूर बख़्श देगा।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| सियाह-नामा | पाप-पत्र / कुकर्मों का लेखा-जोखा (काली कर्म-पत्रिका) |
| शिआर | स्वभाव / आदत / तरीका |
| जलाल-ओ-जलालत | महिमा और प्रताप / महानता व रौब |
| लग़्ज़िश / नवाज़िश | चूक या भूल / कृपा या मेहरबानी |
| सरापा | सिर से पैर तक / पूर्ण रूप से |
| नवीद-ए-बख़्शिश | क्षमा या मुक्ति की ख़ुशख़बरी |
इस प्रार्थना का मुख्य सार यह है कि मनुष्य रात के अँधेरे और दिन के उजाले में किए गए अपने सभी गुप्त व प्रकट पापों को स्वीकार करता है और स्वयं को सिर से पैर तक केवल अपराधों का पुतला मानता है। वह ईश्वर को उसकी दया, प्रताप और पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की रिसालत का वास्ता देकर नरक के कष्टों (अज़ाब) से मुक्ति की भीख माँगता है। अंत में, कवि 'उजागर' पवित्र काबा के द्वार (दर-ए-हरम) पर हाथ बाँधे और सिर झुकाए केवल क्षमा का एक छोटा सा इशारा पाने की आशा में व्याकुल खड़ा है।
लिरिक्स के मुताबिक, बंदा दर-ए-हरम पर किस हालत में खड़ा होकर माफ़ी माँग रहा है?