मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मरहबा या मरहबा आए मुहम्मद मुस्तफा
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हुस्नैन अकबर
नातख्वान/कलाकार: फैज़ उल हसन फैज़ी
जोड़ा गया : 07 Sep, 2025 01:37 PM IST
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या मरहबा सल्ले अल्लाह, या मरहबा सल्लेअल्लाह,
या मरहबा सल्ले अल्लाह, या मरहबा सल्लेअल्लाह।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा,
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
सल्लेअल्लाह, सुब्हानअल्लाह, आए मुहम्मद मुस्तफा।
आप जे आएं जगमग-जगमग होया आलम सारा,
अर्शियां-फर्शियां मलिया आके, आपदा पाक दुआरा।
माशा’अल्लाह, सुब्हानअल्लाह, आए मुहम्मद मुस्तफा।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
अरबी सुल्तान आया...
ऊंचे-नीचे दे शोणां फ़र्क मिटाने आया...
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
नूर दिया बरसाता होया, मुक गईं कालीयां रत्तां,
झंडियां लेके जिब्रील-ए-अमीन ने पढ़ियां नातां।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
आ गए पाक अब्दुल्लाह दे चांद, आ गई खुशहाली,
आमिना पाक दे लाल दे सद्के भर गए कासे खाली।
बादशाहां दे बादशाह, आए मुहम्मद मुस्तफा।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
शोंधियां-शोंधियां नैना वाले रब दे माही आए,
हुसैन अकबर, खुश-बख़्ता ने आप दे जश्न मनाए।
अल्लाहुम्मा सल्लेअल्लाह, आए मुहम्मद मुस्तफा।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
सल्लेअल्लाह, सुब्हानअल्लाह, आए मुहम्मद मुस्तफा।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
मरहबा या मरहबा, आए मुहम्मद मुस्तफा।
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यह कलाम हुज़ूर मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की विलादत (जन्म) की खुशी में पढ़ा जाने वाला एक अत्यंत उत्साहपूर्ण गीत है। इसमें पंजाबी और उर्दू के मेल से पूरी दुनिया में फैली नूर की लहरों और उनकी आमद के जश्न का वर्णन है।
कवि कहता है कि नबी ﷺ के आगमन से पूरे ब्रह्मांड में उजाला हो गया है और स्वर्ग व पृथ्वी के सभी जीव उनके स्वागत में खड़े हैं। वे दुनिया से ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाने और दुख की काली रातों को खत्म कर नूर की बरसात करने के लिए तशरीफ लाए हैं।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मरहबा | स्वागत (Welcome) |
| अर्शियां-फर्शियां | आसमान और ज़मीन के रहने वाले |
| आलम | संसार / दुनिया |
| मुक गईं | खत्म हो गईं |
| कालीयां रत्तां | काली रातें (अज्ञानता का अंधकार) |
| कासे | भिक्षुओं के कटोरे / खाली हाथ |
| सद्के | उनके नाम की बरकत से |
| माही | प्रिय / महबूब |
इस कलाम का सार यह है कि हज़रत अब्दुल्लाह के चाँद और बीबी आमिना के लाल ﷺ के आने से मानवता को खुशहाली मिली है। जिब्रील AS ने झंडे लगाकर उनके आने की गवाही दी और उनके आने से गरीबों के खाली कटोरे भर गए। यह नात बताती है कि वे केवल एक धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए 'बादशाहों के बादशाह' बनकर आए हैं।
"ऊंचे-नीचे दे शोणां फ़र्क मिटाने आया"—क्या यह पंक्ति सामाजिक समानता के उस संदेश को पुख्ता नहीं करती जो इस्लाम की रूह है?