मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : लब्बैक या रसूल-अल्लाह
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अल्लामा निसार अली उजागर
नातख्वान/कलाकार: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी
जोड़ा गया : 06 Sep, 2025 01:31 PM IST
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लब्बैक या रसूल-अल्लाह! लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
ख़ुद को मिटा देंगे, हम जान लुटा देंगे,
नामूस-ए-आक़ा पर, हम सर कटा देंगे।
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
हाज़िर हैं, हाज़िर हैं, हाज़िर हैं हम!
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
क़रया-क़रया, बस्ती-बस्ती, ज़िक्र-ए-नबी का आम करो,
प्यारे आक़ा के दीवानों! हाथ में डाले हाथ चलो।
हब्ब-ए-नबी का हर दिल में, तुम जा के दीप जलाओ,
ऊँचे में ऊँचा नबी का झंडा, घर-घर में लहराओ।
ख़ुद को मिटा देंगे, हम जान लुटा देंगे,
नामूस-ए-आक़ा पर, हम सर कटा देंगे।
इब्न-ए-अली ने कर्बो-बला में, तुम को ये पैग़ाम दिया,
याद रखो, प्यारे आक़ा ने, तुम को पाक निज़ाम दिया।
तोड़ दो बाहों की कुव्वत को, ज़ुल्म के ऐजां ढाओ,
ऊँचे में ऊँचा नबी का झंडा, घर-घर में लहराओ।
ख़ुद को मिटा देंगे, हम जान लुटा देंगे,
नामूस-ए-आक़ा पर, हम सर कटा देंगे।
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
हाज़िर हैं, हाज़िर हैं, हाज़िर हैं हम!
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
सब्ज़ हिलाली परचम यारों! हम को जान से प्यारा है,
इस पर गुम्बद-ए-ख़ज़रा हो, ये मंसूर हमारा है।
इस गुम्बद के साए तले, तुम सारे एक हो जाओ,
नबी का झंडा, अमन का झंडा, हर घर में लहराओ।
ख़ुद को मिटा देंगे, हम जान लुटा देंगे,
नामूस-ए-आक़ा पर, हम सर कटा देंगे।
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
हाज़िर हैं, हाज़िर हैं, हाज़िर हैं हम!
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
लब पर नात-ए-पाक का नग़मा, कल भी था और आज भी है,
मेरे नबी से मेरा रिश्ता, कल भी था और आज भी है।
बतला दो तुम दुश्मन-ए-नबी को, ग़ैरत-ए-मुस्लिम ज़िंदा है,
दीन पे मर मिटने का जज़्बा, कल भी था और आज भी है।
ख़ुद को मिटा देंगे, हम जान लुटा देंगे,
नामूस-ए-आक़ा पर, हम सर कटा देंगे।
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
हाज़िर हैं, हाज़िर हैं, हाज़िर हैं हम!
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
रंग-बिरंगे झंडे छोड़ो, थाम लो गुम्बद वाला,
हम से राज़ी हो जाएगा, शह-ए-मदीना वाला।
इस परचम के साए तले, तुम मिल कर क़दम बढ़ाओ,
ऊँचे में ऊँचा नबी का झंडा, घर-घर में लहराओ।
ख़ुद को मिटा देंगे, हम जान लुटा देंगे,
नामूस-ए-आक़ा पर, हम सर कटा देंगे।
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
हाज़िर हैं, हाज़िर हैं, हाज़िर हैं हम!
लब्बैक लब्बैक लब्बैक या रसूल-अल्लाह!
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यह कलाम नबी-ए-करीम (स.अ.व) की शान और उनकी नामूस (इज़्ज़त) की हिफाज़त के लिए अटूट वफ़ादारी और बलिदान का एक बुलंद एलान है। इसमें हर हाल में हुज़ूर के बताए रास्ते पर चलने और उनके परचम को थामे रखने का संकल्प है।
Lyrics Explanation
इन पंक्तियों का उद्देश्य मोमिनों को यह याद दिलाना है कि उनकी असली पहचान और ताक़त नबी की मुहब्बत में है। यह कलाम कर्बला के पैग़ाम के ज़रिए ज़ुल्म के खिलाफ खड़े होने, आपसी मतभेद भुलाकर एक होने और दुनिया के हर कोने में इस्लाम के अमन और भाईचारे का संदेश पहुँचाने की प्रेरणा देता है।
Word Meanings (शब्द-अर्थ)
| Word | Meaning (Hindi/English) |
|---|---|
| लब्बैक | मैं हाज़िर हूँ (I am present) |
| नामूस | प्रतिष्ठा / इज़्ज़त (Honor/Sanctity) |
| क़रया-क़रया | गाँव-गाँव / बस्ती-बस्ती (Village to village) |
| इब्न-ए-अली | हज़रत अली के पुत्र (इमाम हुसैन) |
| ऐजां | तकलीफ़ / अत्याचार (Oppression/Hardship) |
| सब्ज़ हिलाली | हरा चाँद-तारे वाला झंडा (Green Crescent Flag) |
| मंसूर | उद्देश्य / मैनिफेस्टो (Aims/Objective) |
| ग़ैरत | आत्म-सम्मान / खुद्दारी (Self-respect) |
Summary (सार)
इस कलाम का सार यह है कि एक मुसलमान के लिए हुज़ूर (स.अ.व) की इज़्ज़त अपनी जान से भी बढ़कर है। यह नबी के चाहने वालों को एकता का संदेश देता है कि वे दुनियावी गुटों और रंगों को छोड़कर सिर्फ गुम्बद-ए-ख़ज़रा (हरे परचम) के साए तले एकजुट हो जाएं। अंततः, यह दीन के लिए मर-मिटने के कभी न खत्म होने वाले जज़्बे और वफ़ादारी का एक भावपूर्ण इज़हार है।
नात के आखिरी मिसरों में "रंग बिरंगे झंडे" छोड़कर कौन सा परचम (झंडा) थामने की बात की गई है, और इसका मकसद क्या बताया गया है?