मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 28 Mar, 2023 12:11 PM IST
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भूल गईली तैबा के डहरिया रे ऐ सखी हमका बता द
कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
याद जब आवेले ताईबा नगरिया
त बरसेला नैयना जैसे सावन में बदरिया
दिल मा त उठालेई दरदिया रे ऐ सखी हमका बता द
तड़पत् रहेला मोरा मनवा अकेला
अब त सहत नाइखे जग के झमेलवा
देख लेती आका के शहरीया रे ऐ सखी हमका बता द
कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
सफा और मरवा पे जब हम पहुँच बे
चुन चुन कंकर से शेहतान के मरबी
फिर त लगईबा साथ चकारिया रे ऐ सखी हमका बता द
कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
काबा मा हुमहू या रब एक दिन जाईती
तो होठवा से हजरे अस्वद लगवती
धूल जाई तक पाप के गठरिया तक रे ऐ सखी हमका बता द
कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
सुनली मलाईका के लागेला मेला
हिन्द मे पड़ल् हयी तन्हा अकेला
कब होई हम पे नजरिया रे ऐ सखी हमका बता द
कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
भूल गईली तैबा के डहरिया रे ऐ सखी हमका बता द
कैसे जाऊ आक़ा के नगरिया रे ऐ सखी हमका बता द
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यह भोजपुरी भाषा में रचित एक अत्यंत भावुक और अनूठी नात शरीफ़ है। इसमें एक आशिक़-ए-रसूल (भक्त) अपनी सहेली (सखी) के माध्यम से मदीना मुनव्वरा की पवित्र यात्रा (हज और उमराह) के लिए अपनी गहरी व्याकुलता और बेबसी को बहुत ही सुरीले अंदाज़ में व्यक्त कर रहा है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि "हे सखी! मैं मदीने (तैबा) का रास्ता भूल गई हूँ, मुझे बता दो कि मैं अपने आक़ा ﷺ की नगरी कैसे जाऊँ?" जब भी मुझे मदीने की याद आती है, तो मेरी आँखों से सावन के बादलों की तरह आँसू बरसने लगते हैं और दिल में आक़ा के दीदार की एक असीम तड़प और दर्द उठने लगता है।
| शब्द (भजपुरी) | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| डहरिया | रास्ता / राह या मार्ग |
| नगरिया / शहरिया | नगरी / शहर (मदीना शरीफ़) |
| नैयना / बदरिया | आँखें / बादल |
| मनवा / नाइखे | मन / नहीं (सहन नहीं होता) |
| सफ़ा और मरवा | मक्का मुक़द्दस की दो पवित्र पहाड़ियाँ |
| चकारिया | चक्कर / काबा के सात फेरे (तवाफ़) |
| हजरे अस्वद | काबा में लगा पवित्र काला पत्थर जिसे चूमा जाता है |
| पाप के गठरिया | पापों और गुनाहों का बोझ |
| मलाईका | फ़रिश्ते / देवदूत |
इस ख़ूबसूरत भोजपुरी नात का मूल सार यह है कि भक्त हिंदुस्तान (हिन्द) में ख़ुद को अकेला पाकर मक्का और मदीने जाने के लिए बेचैन है। उसकी दिली तमन्ना है कि वह काबा जाकर 'हजरे अस्वद' को चूमे ताकि उसके जीवन के पापों की गठरी धुल जाए, और सफ़ा-मरवा की दौड़ लगाकर शैतान को कंकड़ मारे। वह रोते हुए अपने आक़ा ﷺ से गुहार लगाता है कि इस दुनिया के झमेलों (मुसीबतों) से थककर अब वह सिर्फ़ मदीना देखना चाहता है, इसलिए उस पर आक़ा की करम की नज़र कब होगी।
शायर के मुताबिक काबा जाकर 'हजरे असवद' को चूमने (होंठ लगाने) से उनपर क्या असर होगा और उनकी 'पाप की गहरिया' का क्या होगा?