मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : Jiara Kahela Bar Bar Hum Madina Jaibe
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : राही बस्तवी
नातख्वान/कलाकार: राही बस्तवी
जोड़ा गया : 24 Sep, 2022 01:55 PM IST
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Jiara Kahelea Bar Bar Hum Madina Jaibe,
Jiara Kahelea Bar Bar Hum Madina Jaibe,
Jahiya Bulaiyye Sarkar Hum Madina Jaibe,
Jahiya Bulaiyye Sarkar Hum Madina Jaibe
Na Chahi Rupya Paisa Na Heera Motiya,
Na Chahi Rupya Paisa Na Heera Motiya
Aaqa Badha Do Hamre Nainan Ki Jotiya,
Aaqa Badha Do Hamre Nainan Ki Jotiya
Yadon Me Tumre Tadpe Sari Sari Ratiya,
Yadon Me Tumre Tadpe Sari Sari Ratiya
Kadmo Pe Jannat Ke Bahar Hum Madina Jaibe,
Kadmo Pe Jannat Ke Bahar Hum Madina Jaibe
Jahiya Bulaiyye Sarkar Hum Madina Jaibe,
Jahiya Bulaiyye Sarkar Hum Madina Jaibe
Tumre Duware Jave Jab Dhanwanva,
Tumre Duware Jave Jab Dhanwanva,
Kuhke Kareja Mora Tadpela Manva,
Birha Ki Agni Me Jhulse Paranva,
Ab Nahi Karbe Intejar Hum Madina Jaibe,
Ab Nahi Karbe Intejar Hum Madina Jaibe
Jahiya Bulaiyye Sarkar Hum Madina Jaibe,
Jahiya Bulaiyye Sarkar Hum Madina Jaibe
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यह नात शरीफ़ भोजपुरी और अवधी भाषा के खूबसूरत मिश्रण में लिखी गई है, जो एक सीधे-सादे भक्त (आशिक-ए-रसूल) के दिल की सादगी, बेचैनी और मदीना शरीफ़ जाने की गहरी तड़प को दर्शाती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मेरा दिल (जियरा) बार-बार यही कह रहा है कि मैं मदीना जाऊँगा; जब भी मेरे आका ﷺ मुझे बुलाएँगे, मैं सब छोड़-छाड़ कर चला जाऊँगा। मुझे दुनिया का धन-दौलत, रुपया-पैसा या हीरा-मोती नहीं चाहिए, बस मेरे आका मेरी आँखों की रोशनी (नैनन की जोतिया) बढ़ा दें ताकि मैं उनका मुक़द्दस शहर देख सकूँ, क्योंकि उनके कदमों में ही स्वर्ग की असली बहार है।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| जियरा | दिल / हृदय या मन |
| जहिया | जिस दिन / जब भी |
| नैनन की जोतिया | आँखों की रोशनी / दृष्टि |
| रतिया | रातें |
| धनवंवा | धनवान / अमीर लोग |
| कुहके करेजा | दिल रोता है / कलेजा तड़पता है |
| बिरहा | विरह / जुदाई का गम |
| परनवा | प्राण / जान |
कवि कहता है कि जब वह समाज के अमीर लोगों (धनवानों) को मदीना शरीफ़ जाते हुए देखता है, तो उसका कलेजा रो उठता है और जुदाई की आग में उसके प्राण झुलसने लगते हैं। वह सारी-सारी रात हुज़ूर ﷺ की यादों में तड़पता रहता है। अब उससे और अधिक प्रतीक्षा नहीं होती, वह दुनिया की तमाम सुख-सुविधाओं को ठुकराकर सिर्फ अपने आका के दरबार में हाज़िरी देना चाहता है।
शायर के अनुसार, जब किसी धनवानवा (अमीर इंसान) को सरकार के दुआरे (दरबार) जाते देखता है, तो उसके दिल और परनवा (प्राण) पर क्या असर पड़ता है?