मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : जागो शबे बरात इबादत की रात है
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: राव अली हसनैन
जोड़ा गया : 23 Feb, 2024 06:26 AM IST
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जागो शबे बरात, इबादत की रात है
अल्लाह के हबीब के प्यारे की रात है
बंदों के वास्ते ये करामत की रात है
अल्लाह अल्लाह, अल्लाह अल्लाह
अल्लाह अल्लाह, अल्लाह अल्लाह
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
सज्दे में सर झुकाओ, शफ़ाअत की रात है
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
जागो..., जागो..., जागो..., जागो...
नूरी महफ़िल पे चादर तानी नूर की
नूर फैला हुआ आज की रात है
चाँदनी में हैं डूबे हुए दो जहान
कौन जलवा नुमा आज की रात है
खुदा को याद करो, खुदा को याद करो
सुन ले सदा मज़बूरों की, ऐ मालिक-ए-जहान
भर दे जो मांगते हैं मुरादों से जोलिया
रह जाए ना मायूस कोई आज सवालि
दामन किसी का जाए ना मौला मेरे खाली
ये रात क्या है आज ज़माने को बता दे
सदके में मुहम्मद के कोई जलवा दिखा दे
बंदों को तोफ़ा बख़्शा है बंदा नवाज़ ने
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
जागो..., जागो..., जागो..., जागो...
फ़र्श पर धूम है, अर्श पर धूम है
बदनसीबी है उसकी जो महरूम है
फिर मिलेगी शब ये किसको मालूम है
आम लुत्फे ख़ुदा आज की रात है
अल्लाह अल्लाह, अल्लाह अल्लाह
अल्लाह अल्लाह, अल्लाह अल्लाह
इस शब में जिसने मांगा वही उसको मिल गया
अल्लाह ने मुरादों से दामन को भर दिया
खाली ना कोई जाएगा इस शबे बरात में
रहमत-ए-ख़ुदा पाएगा इस शबे बरात में
ईमान ताज़ा होता है इस शबे बरात को
बख़्शी है मौला ने ताक़त इस रात को
बंदों पे अपने उसकी इनायत की रात है
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
जागो शबे बरात, इबादत की रात है
जागो..., जागो..., जागो..., जागो...
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यह कलाम शब-ए-बरात की महानता और उस रात की रूहानी अहमियत को दर्शाता है। इसमें मोमिनों को रात भर जागकर इबादत करने और अल्लाह की रहमतें समेटने की प्रेरणा दी गई है।
शायर कहता है कि शब-ए-बरात अल्लाह की तरफ से बंदों के लिए एक नायाब तोहफा है, जिसमें हर मजबूर की पुकार सुनी जाती है। यह रात गुनाहों की माफ़ी (बख़्शिश) और हुज़ूर ﷺ की शफ़ाअत पाने का बेहतरीन अवसर है, जहाँ कोई भी सवाली खाली हाथ नहीं लौटता।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| शबे बरात | मुक्ति या नजात की रात |
| शफ़ाअत | सिफ़ारिश (हुज़ूर ﷺ द्वारा) |
| करामत | ईश्वरीय चमत्कार या कृपा |
| महरूूम | वंचित (जिसे लाभ न मिला हो) |
| बंदा नवाज़ | अपने बंदों पर मेहरबानी करने वाला (अल्लाह) |
| इनायत | कृपा या दया |
| मुराद | इच्छा या मन्नत |
इस कलाम का सार यह है कि शब-ए-बरात इबादत और तौबा की रात है। यह रात ज़मीन से आसमान तक नूर और अल्लाह के लुत्फ़ (कृपा) से भरी होती है। शायर समझाता है कि वह इंसान बदनसीब है जो इस रात सोकर गुज़ार दे, क्योंकि यह पाक रात ईमान को ताज़गी देने और अपनी झोलियाँ खुशियों से भरने के लिए आती है।
सवाल: इस कलाम के अनुसार, वह कौन सा व्यक्ति है जिसे शायर ने 'बदनसीब' कहा है?
लिरिक्स के आखिर में शायर ने "ईमान" और "ताक़त" के हवाले से इस रात की क्या फ़ज़ीलत बयान की है, और बंदों पर ख़ुदा की किस तरह की इनायत का ज़िक्र किया है?