मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : हमने आंखों से देखा नहीं है मगर
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: अलीशा कियानी हाफ़िज़ कामरान क़ादरी
जोड़ा गया : 28 Sep, 2023 02:51 AM IST
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हमने आंखों से देखा नहीं है मगर,
उनकी तस्वीर सीने में मौजूद है,
जिसने ला कर कलामे इलाही दिया,
वो मुहम्मद मदीने में मौजूद है,
है नजर में जमाले हबीबे खुदा,
उनकी तस्वीर सीने में मौजूद है,
जिसने ला कर कलामे इलाही दिया,
वो मुहम्मद मदीने में मौजूद है,
फूल खिलते हैं पढ़ कर के सल्ले अल्लाह,
झूम कर कह रही है ये बाद-ए-सबा,
ऐसी खुशबू चमन के गुलों में कहाँ,
जो नबी के पसीने में मौजूद है,
छोड़ना तेरा तैबा गवारा नहीं,
सारी दुनिया में ऐसा नज़ारा नहीं,
ऐसा मंज़र ज़माने ने देखा नहीं,
जैसा मंज़र मदीने में मौजूद है,
हमने माना के जन्नत बहुत है हसीं,
छोड़ कर हम मदीना न जाएँ कहीं,
यूं तो जन्नत में सब है मदीना नहीं,
और जन्नत मदीने में मौजूद है,
बेसहारों को सीने से लिपटा लिया,
जिसने जो मांगा उसको अता कर दिया,
वो फकीरों के अफ़सर शाहे अंबिया,
वो शहंशाह मदीने में मौजूद है
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यह कलाम नबी ﷺ की बेमिसाल अज़मत और उनसे अटूट मोहब्बत का इज़हार है, जिसमें बताया गया है कि भले ही हमने उन्हें अपनी आँखों से न देखा हो, पर उनकी याद और तालीमात हर मोमिन के दिल में बसी हैं।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हुज़ूर ﷺ की शान और उनकी पाक हस्ती ही जन्नत की असल रौनक है। शायर कहता है कि दुनिया के किसी भी फूल में वैसी खुशबू नहीं जो नबी ﷺ के पसीने में है, और न ही दुनिया का कोई नज़ारा मदीने की गलियों जैसा सुकून दे सकता है। उन्होंने न केवल हमें अल्लाह का कलाम (क़ुरआन) दिया, बल्कि हर बेसहारे को अपना सहारा भी बनाया।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| जमाले हबीबे खुदा | खुदा के महबूब की खूबसूरती (Beauty of Allah's Beloved) |
| बाद-ए-सबा | सुबह की ठंडी हवा (Morning Breeze) |
| गुलों | फूलों (Flowers) |
| तैबा | मदीने का दूसरा नाम (Another name for Medina) |
| शाहे अंबिया | नबियों के बादशाह (King of Prophets) |
| अता | दान देना या प्रदान करना (To grant/bestow) |
इस नात का सार यह है कि मदीना वह मुक़द्दस जगह है जहाँ रहमतों का सुल्तान बसता है। शायर के अनुसार, जन्नत कितनी भी हसीन क्यों न हो, वह मदीने से बढ़कर नहीं हो सकती क्योंकि जन्नत में सब कुछ है पर मदीना नहीं, जबकि मदीने में खुद जन्नत मौजूद है। हुज़ूर ﷺ की सख़ावत (दानवीरता) ऐसी है कि उन्होंने माँगने वाले हर ज़रूरतमंद की झोली भर दी।
इस नात के मुताबिक, शायर ने जन्नत और मदीने के दरमियान क्या फर्क बताया है?