मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 01 Aug, 2023 06:14 PM IST
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होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का,
फिर पाँव उम्मती कहाँ रखता रसूल का।
करते हैं एहतेराम हम जनाज़े का इसलिए,
वो जा रहा है देखने चेहरा रसूल का।
होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का।
दुनिया को देखना भी गवारा नहीं किया,
जब तक अली ने देखा न चेहरा रसूल का।
होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का।
शेर-ए-खुदा न बनता तो बनता भी और क्या,
बचपन से ही जो पला हुआ था रसूल का।
होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का।
पढ़ते हैं यूँ तो गैर भी कलमा रसूल का,
जन्नत उसे मिलेगी जो होगा रसूल का।
होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का।
नारा रज़ा का लगता है दुनिया में इसलिए,
मेरे रज़ा के लब पे था नारा रसूल का।
होता अगर ज़मीन पर साया रसूल का,
फिर पाँव उम्मती कहाँ रखता रसूल का।
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यह अत्यंत सुंदर और अक़ीदत (श्रद्धा) से भरपूर नात-ए-पाक हुज़ूर पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के नूरानी वजूद की महानता, उनके पावन घराने (अहले बैत) की अज़मत और उनसे सच्ची मोहब्बत करने वालों के ऊँचे मक़ाम को बयां करती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि यदि पृथ्वी पर मेरे नबी ﷺ की पावन परछाई (साया) होती, तो कोई भी उम्मती जाने-अनजाने उस पर पैर रखने की गुस्ताख़ी कर बैठता, इसलिए ईश्वर ने उनका साया ही नहीं बनाया। शायर कहता है कि मौला अली ने जन्म के बाद तब तक अपनी आँखें नहीं खोलीं जब तक उन्होंने नबी ﷺ का पवित्र चेहरा नहीं देख लिया, क्योंकि उनका पालन-पोषण स्वयं नबी के हाथों हुआ था।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| साया | परछाई / अक्स |
| उम्मती | पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के अनुयायी / मानने वाले |
| एहतेराम | आदर / सम्मान |
| गवारा | स्वीकार / मंज़ूर |
| शेर-ए-खुदा | अल्लाह का शेर (हज़रत अली की उपाधि) |
| गैर | पराए / वे जो दिल से वफ़ादार नहीं हैं |
| लब | होंठ |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि नबी ﷺ का वजूद पूरी तरह नूर (प्रकाश) था और उनकी ताज़ीम सबसे बढ़कर है; यहाँ तक कि मुसलमान जनाज़े का सम्मान भी इसलिए करते हैं क्योंकि मरने वाला क़ब्र में नबी का दीदार करने जा रहा है। शायर स्पष्ट करता है कि केवल ज़ुबान से कलमा पढ़ना काफ़ी नहीं है, स्वर्ग (जन्नत) केवल उसी को नसीब होगी जो सच्चे दिल से नबी का हो चुका है। अंत में 'रज़ा' (आला हज़रत) का ज़िक्र है कि दुनिया में उनका नाम इसलिए गूंजता है क्योंकि उन्होंने जीवन भर नबी की शान का नारा बुलंद किया।
लिरिक्स के मुताबिक, ख़ुदा ने ज़मीन पर नबी-ए-करीम ﷺ का साया क्यों नहीं बनाया?