मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : हुजूर मुफ्ती आज़म ए हिंद मुस्तफा रज़ा खान नूरी
नातख्वान/कलाकार: ओवैस रज़ा कादरी
जोड़ा गया : 30 Jul, 2023 10:48 AM IST
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हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं,
दिल-ओ-जान उन पर निसारा करूं मैं।
मुझे अपनी रहमत से तू अपना कर ले,
सिवा सब से तेरे किनारा करूं मैं।
हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं,
दिल-ओ-जान उन पर निसारा करूं मैं।
मैं क्यूँ गैर की ठोकरें खाने जाऊँ,
तेरे दर से अपना गुज़ारा करूं मैं।
हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं,
दिल-ओ-जान उन पर निसारा करूं मैं।
ये एक जान क्या है अगर हों करोड़ों,
तेरे नाम पर सबको वारा करूं मैं।
हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं,
दिल-ओ-जान उन पर निसारा करूं मैं।
तेरे दर के होते कहाँ जाऊँ प्यारे,
कहाँ अपना दामन पसारा करूं मैं।
हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं,
दिल-ओ-जान उन पर निसारा करूं मैं।
सबा ही से नूरी सलाम अपना कह दे,
सिवा उसके क्या और चारा करूं मैं।
हबीबे खुदा का नज़ारा करूं मैं,
दिल-ओ-जान उन पर निसारा करूं मैं।
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यह अत्यंत भावपूर्ण और प्रसिद्ध नात-ए-पाक (मुफ़्ती-ए-आज़म हिंद, हज़रत मुस्तफ़ा रज़ा ख़ान 'नूरी' द्वारा रचित) पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ के प्रति एक सच्चे आशिक़ की अगाध श्रद्धा, उनके दर से गहरी निष्ठा और अपनी जान न्योछावर करने के जज़्बे को दर्शाती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि मेरी बस यही अंतिम इच्छा है कि मैं जीवन भर अल्लाह के प्यारे महबूब, यानी मेरे नबी ﷺ का दीदार (नज़ारा) करता रहूँ और अपना दिल व जान उन पर कुर्बान कर दूँ। शायर ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे अपनी विशेष कृपा से अपना बना ले, ताकि वह दुनिया के सभी झूठे रिश्तों और सहारों को छोड़कर केवल ईश्वर और उसके रसूल ﷺ का होकर रह जाए।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| हबीबे खुदा | अल्लाह के प्यारे दोस्त/महबूब (नबी ﷺ) |
| निसारा / वारा | कुर्बान करना / न्योछावर करना |
| किनारा करना | अलग हो जाना / छोड़ देना |
| ग़ैर | पराए / अन्य लोग |
| पसारा करना | फैलाना (जैसे मदद के लिए झोली या दामन फैलाना) |
| सबा | सुबह की ठंडी और धीमी हवा |
| चारा | उपाय / रास्ता या विकल्प |
इस नात का मुख्य सार यह है कि एक सच्चे भक्त के लिए पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ की चौखट ही सर्वोपरि है; वह दूसरों के द्वारों पर ठोकरें खाने के बजाय केवल नबी ﷺ के दर का सवाली बनकर जीना चाहता है। शायर कहता है कि यदि उसके पास एक के बजाय करोड़ों जीवन भी हों, तो वह उन सबको नबी ﷺ के पावन नाम पर सहर्ष न्योछावर कर देगा। अंत में शायर 'नूरी' सुबह की हवा (सबा) के माध्यम से नबी ﷺ की बारगाह में अपना व्याकुल सलाम भेजता है, क्योंकि उसकी विरह-वेदना का इसके सिवा कोई और उपाय (चारा) नहीं है।
लिरिक्स के मुताबिक, अगर शायर के पास एक के बजाय करोड़ों जानें हों, तो वह उनका क्या करेगा?